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________________ UARNAME वेग स भर २३८ ] [गो. प्र. चिन्तामणि : स्त्रियों को अतिशय प्रिय लगने वाले हैं, तीन शक्ति कहिये प्रभुत्व, मन्त्र, उत्साह. इन . गुगणों सहित हैं, तथा सत्व, पराक्रम और शील कहिये मुस्वभाव के अवलम्बन करने वाले हैं तथा विज्ञान, प्रवीणता और विनय वा उत्तम प्रीति के प्रसर कहिये वेग से भरे हैं । स्वर्ग में समस्त देवं इसी प्रकार स्वभाव से मुन्दर होते हैं। न तत्र दुःखितो. दोनो वृद्धो रोगी गुरगच्युलः ।। विकलाङ्गो गतश्रीकः स्वर्गलोके बिलोक्यते ॥३५०॥ तथा उस स्वर्ग में कोई ऐसा नहीं देखा जाता जो दुःखी, दीन, वृद्ध या रहित, किल-अंग अथवा कान्ति हीन हो । ... सभ्य सामानिका लोक पाल प्रकीर्णकाः । मित्राद्यभिमतस्तेषां पार्श्व वर्तों परिग्रहः ॥३५१॥ स्वर्गों में सभ के देव, सामानिक देव, : समादिक देव, लोक पाल देव, प्रकीर्णक देव ये भेद हैं । तथा मित्र आदिक सव ही इन इन्द्रों के. पार्श्ववर्ती परिवार उनके अभिमत (इष्ट प्रीति करने वाले) हैं। बन्दि गायन सैरन्ध्री स्वाङ्ग रक्षाः पदातयः । नटवेत्रि विलासिन्यः सुराणां सेवको जनः ।।३५२।। तथा स्त्रों में उन देवों की सेवा करने वाले देव हैं, बन्दीजन हैं, गाने वाले. हैं, नङ्ग रक्षक है, दंड धरने वाले हैं तथा नाचने वाली बिलासिनी अप्सरायें हैं । तशतिभव्यताधारे विमाने कुन्द. कोमले । उपपादि शिला गर्भ संभवन्ति स्वयं सुराः ॥३५३।। . स्वगों में अति मनोजता का प्राधार ऐसे विमान में कुन्द के पुष्प समान कोमल ऐसी उपपादि शिला के मध्य से देव स्वयमेव उत्पन्न होते हैं । भावार्थ :-देवों के उत्पन्न होने की उपपादि शय्या है, उस पर जन्म लेते हैं: जिस प्रकार कोई सोया हया आदमी उठता है. इसी प्रकार जिसका स्वर्ग में जन्म होता है, वह जीव पुगि । उस उपपाद शय्या पर उठता है। . सर्वाक्ष सुखदे रम्ये नित्योत्सव विराजिते ।। गीत वादिश्व लीलाढये जय जीवस्वना कुले ।।३५४॥ दिव्याकृति सुसंस्थानाः सप्तधातु विजिताः।। काथ कान्ति पयः पूरैः प्रसादित दिगन्तराः ॥३५५।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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