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अध्याय : पांचवा ]
हाव भाव बिलासाढया नितम्ब भरमन्थरा ॥३४३॥ मन्ये शृगार सर्वस्य मेकीकृत्य विनिर्मिताः। स्वर्गवास विलासिन्यः संति मूर्ला इव श्रियः ॥३४४।।
उन स्वर्गों में विलासीन देवांगनायें शृगार का सार है जिनके ऐसी लावण्य रूपी जल को वापिका ही हैं तथा पीन कुचों के भार सहित हैं, जिनके मुख पूर्णमासी के चन्द्रमा के समान हैं, विनीत हैं, चतुर हैं, महा ऋद्धि की शोभा सहित हैं, मुख के हाव भाव चित्तविकार, विलास, ध्र विकार आदि से भरी हुई हैं, नितम्बो के भार से धीर गति वाली हैं। प्राचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि वे देवांगनायें मानो शृगार का सर्वस्व एकत्र करके ही बनाई गई हैं, जिससे मूर्तिमान लक्ष्मी समान ही शोभती
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गीतवादित्र विद्यासु शृगार रस भूमिषु । परिरम्भादि सर्वेषु स्त्रीणां दाक्ष्यं स्वभावतः ॥३४५॥
स्वर्गों में शृगार रस की भूमि ऐसी गीत व बाजे की विद्यानों तथा प्रालिंगA. नादि समस्त क्रियाओं में स्त्रियों की स्वभाव से ही प्रवीणता होती है। .
सर्वावयव सम्पुर दिव्य लक्षण लक्षिताः । अनङ्ग प्रतिमा धीराः प्रसन्नाः पांशु विग्रहाः ॥३४६।। हारकुण्डल केयूर किरीटाङ्गद भूषिताः । मंदार मालती गन्धा अणिमादि गुणान्विताः॥३४७।। प्रसन्नामल पूर्वेन्दु कान्ताः कान्ताजन प्रियाः । शक्तित्रय गुणोपेताः सत्त्व शीलावलम्बिनः ।।३४८।। विज्ञान विनियोदाम प्रोति प्रसर संभृताः । निसर्ग सुभगाः सर्वे भवन्ति त्रिदिवौकसः ॥३४६॥
उन स्त्रों में देव जो कि शरीर के समस्त अवयब जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्य सनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेव के समान सुन्दर हैं, धीर (क्षोभ रहित) है. प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हूँ तथा हार कुण्डल केयूर (भुजबन्ध) किरीट (मुकुट) अंगदः (कटक यादि) इन आभूषणों से भूपित हैं, मन्दार मालती के पुष्पों के समान जिनके अंग में सुगन्धि है; अरिणमा महिमादि नष्ट ऋद्धि सहित हैं प्रसन्न निर्मलः पूर्ण चन्द्रमा समान मनोहर हैं और कान्ताजन कहिये .