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[ गो. प्र. चिन्तामणि नित्योत्सरयुतं रम्यं सर्वाभ्युदय मन्दिरम् । सुख संपद् गुणाधारं के स्वर्गमुपमीयते ॥३३६।।
प्रत्येक स्वर्ग नित्य ही उत्सवों सहित हैं; रमणीक है, समस्त अभ्युदयों के भोगों का निवास है तथा सुख, संपद् और गुणों का आधार है, सो उसको किसकी उपमा दी जाय ?
पञ्चवर्ण महारत्न निर्माणाः सप्त भूमिकाः । . ..। प्रासादाः पुष्करिण्यश्च चन्द्रशाला बनान्तरे ॥३३७॥
तथा उन स्वर्गों के बागों में पांच वर्षों के रत्नों से बने हुए 'सात-सात खण्ड ' के महल हैं और बापिका तथा चन्द्रशाला (शिरोगृह अंटे) हैं।
प्राकार परिखावप्रगोपुरोत्तुङ्ग तोरणैः ।। चैत्यद म सुरागारगर्यो रत्नराजिताः ॥३३८॥
तथा उन स्वर्गों में जो नगरी हैं, वे कोट, खाई, बड़े दरवाजों और ऊँचे तोरगों से तथा. चैत्य वृक्ष और देवों के मन्दिर प्रादिक से रत्नमयी शोभती हैं।
इन्द्रायुध श्रियं धत्ते यत्र नित्यं नमस्तलम् । हाग्रलग्नमारिणक्य मयूखैः कर्बुरीकृतम् ॥३३॥
तथा स्वर्गों में आकाश महलों में लगे हुए रत्नों की किरणों से विचित्र वर्ण का होकर इन्द्रधनुष की सी शोभा को नित्य धारण किये हुए रहता है।
सप्तभिस्त्रिदशानीकविमानै रङ्ग नान्वितैः । कल्पद्रम गिरीन्द्रषु रमन्ते विबुधेश्वराः १३४०॥
स्वर्गों के इन्द्र सात प्रकार की देव सेनानों से तथा देवांगना सहित बिमानों : के द्वारा कल्पवृक्षों तथा क्रीडावनों में रमते (यानन्द करते हैं।
हस्त्यश्वरथ .. पादात. वर्ष गन्धर्वनर्तकि । ... सप्तानीकानि सन्त्यस्य प्रत्येकं च महत्तरम् ॥३४१।।।
'हस्ती, घोड़े, रथ, प्यादे, बैल, गन्धर्व, नर्तकी इस प्रकार सात प्रकार की ... सेना इन्द्र की होती है, सो प्रत्येक एक से बढ़कर एक है।
शङ्कारसार सम्पूर्णा लावण्यवन दीधिकाः। पोनस्तनभरा क्रान्ताः पूर्णचन्द्र निभानमाः ॥३४२॥ विनीताः कामरूपिण्यो महद्धि महिमान्विता । . . .