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________________ PATA .. अध्याय : पांचवां ] . ... यक्ष किन्नर नारीभिर्मन्दार वन वीथिषु । कान्ताम्लिष्टाभिरानन्द गोयन्ते त्रिवशेम्बराः ॥३३०।। तथा बहाँ के इन्द्र, मंदार वृक्षों की गलियों में यक्ष और किन्नर जातीय देवों की देवांगनायें, जो अपने पति सहित प्रालिंगित अानंद से भरी गाती है, के गीत सुनते हैं। श्रीडागिरि निकुञ्जेषु पुष्प शरया गृहेषु वा । रमन्ते त्रिदशा यत्र वरस्त्रीचन्द वेष्टिताः ॥३३॥ तथा उन स्वर्गों के देव क्रीडा पर्वतों की कुजों में, पुष्पलतादि कृत कंदरानो में पुष्पों को शय्या में सुन्दर देवांगानों के समूह के साथ बेष्टित होकर नाना प्रकार की ग्रानंद-क्रीडा करते हैं । ___ मन्दार चम्पकाशोक मालती रेणुरञ्जिताः। . भ्रमन्ति यत्र गन्धाढ्या गन्धवाहाः शनैः शनैः ॥३३२।। उन स्वर्गों में मंदार, चम्पक, अशोक, मालती के पुष्पों की रज से रंजित भ्रमरों सहित मन्दमन्द सुगन्ध पवन बहता है। लीलावन विहारैश्च पुष्पावचयः कौतुकैः ।। जल क्रीडादि विज्ञान विलासास्तत्र योषिताम् ।।३३३।। तथा उन स्वर्गों में देवांगनानों के बिलास, क्रीडावन के विहारों से तथा पुष्यों के चुनने के कौतुक मे तथा जल क्रीड़ा के विज्ञानों (चतुराइयों) से बड़ी शोभा है। वोरणामादाय रत्यन्ते कलं गायन्ति योषितः ।। ध्वनन्ति मुरजा धोरं दिवि देवाङ्गनाहलाः ॥३३४॥ तथा उन स्वर्गों में देवांगनायें संभोग के अन्त में वीणा लेकर सुन्दर गान करती है तथा उनके बजाए हुए मृदंग वीरे धीरे बजते हैं । कोकिलाः कल्पवृक्षेषु चैत्यागारेषु योषितः । विबोधयन्ति देवेशाल्ललित गीत नि:स्वनैः ॥३३५।। तथा उन स्वर्गों में कल्प वृक्षों पर.. तो कोकिलायें और चैत्य मन्दिरों में देवांगनायें सुन्दर गीत और शब्दों से इन्द्रों को प्रानन्द प्रदान करती हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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