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________________ २३४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि उत्पातभयसन्तापभङ्ग चौरारिविद्धराः । न हि स्वप्नेऽपि दृश्यन्ते क्षुद्रसत्त्वाश्च दुर्जनाः ।।३२४॥ तथा उन स्वर्गों में उत्पात, भय, संताप, भंग, चोर, शत्रु, वञ्चक तथा क्षुद्रजीव, दुर्जन ये स्वप्न में नहीं लिखते । ..... चन्द्रकान्तशिलानदाः प्रवालदल दन्तुराः । वन्द्र नोल निर्माणा विचित्रास्तत्र भूमयः ॥३२५।।। उन देवों के निवासों में पृथ्वी चन्द्रकान्त मणियों से बंधी हुई है तथा मूगे. के पत्र की समान रची हुई है; तथा कहीं कहीं हीरा इन्द्रनीलमरिग आदि नाना प्रकार के रत्नों से बनी हुई हैं। .. माणिक्यरोचिषां चक्र: कबुरीकृत दिङ मुखाः । वाप्य स्वर्णाम्बुजच्छन्ना रत्नसोपानराजिताः ॥३२६।। ... तथा स्वर्गों में वापिकायें मार्गिक की किरणों के समूहों में दशों दिशाओं को अनेक वर्ण मय कर रही है तथा सुवर्णमय कमलों से आच्छादित और रत्नमय सीढ़ियों से सुशोभित हैं। सरांस्यमल वारीणि हंसकारण्ड मण्डलैः । वाचाल रुद्वतीर्थानि दिव्यनारीजनेन च ।।३२७॥ स्वर्ग में सरोवर भी अतिस्वच्छ निर्मल जल वाले हैं, हंस वा कारंड जाति के पक्षियों के समूह से तथा देयांगना वा अप्सरायों से रुके हुए हैं तट जिनके ऐसे हैं। गावः कामदुधाः सर्वाः कल्पवृक्षाश्च पादपाः । चिन्तारत्नानि रत्नानि स्वर्गलोके स्वभावतः ।।३२८॥ . तथा उस स्वर्ग में गौ हैं वे तो कामधेनु हैं, वृक्ष हैं, सो कल्पवृक्ष हैं और रत्न हैं सो चिन्तामणि रत्न हैं; ये सब क्षेत्र के स्वभाव से निरन्तर रहते हैं। ध्वजचामप छत्रा विमाननिता सखाः । संचरन्ति सुरासारैः सेव्यमानाः सुरेम्बराः ॥३२६।। . उन स्वर्गों के अधिपति इन्द्र वजा, चमर, छत्रों से चिह्नित हुए विमानों के द्वारा अनेक देवांगनाओं सहित यब-तत्र विचरते हैं; उनकी अनेक देव सेवा करते हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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