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कहीं उत्तम भोगभूमि सहित है, इस प्रकार संक्षेप से मध्यलोक का
अध्याय : पांचवां ]
भरा है, वर्णन किया ।
* उर्ध्वलोक *
ततो नभसि तिष्ठन्ति विमानानि दिवौकसाम्
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freeथाक्रमम् ॥३१६॥
उस मध्य लोक के ऊपर आकाश में ज्योतिषी देवों के विमान रहते हैं, वे चिर स्थिर भेद से दो प्रकार के हैं; अर्थात् कई विमान तो निरन्तर गमन करते रहते हैं और कई विमान स्थिर रहते हैं ।
तदू संन्ति देवेशकल्पाः सौधर्म पूर्वकाः ।
ते षोडशाच्युत स्वर्ग पर्यन्ता नभसि स्थिताः ॥ ३२०
ज्योतिषी देवों के विमानों के ऊपर कल्पवासी देवों के कल्प ( विमान ) हैं ; जिनके सौधर्म स्वर्ग, ईशान स्वर्ग आदि नाम हैं। वे अच्युत स्वर्ग पर्यन्त सोलह हैं और आकाश में स्थित हैं ।
उपर्युपरि देवेशनिवास युगलं क्रमात् ।
अच्युतान्तं ततोऽप्यध्वं मेकैकत्रिदशास्पदम् ॥३२१॥
देवों के निवास (स्वर्ग) श्राकाश में दो स्वर्ग के ऊपर दो स्वर्ग फिर उन दी के ऊपर फिर दो स्वर्ग इस प्रकार दो-दो के आठ युगल हैं और उनके ऊपर एकएक विमान करके नव ग्रैवेयक विमान हैं, तथा एक अनुदिश और एक अनुत्तर विभान भी है ।
निशदिन विभागोऽयं न तत्र त्रिदशास्पदे ।
रत्नालोकः स्फुरत्युच्चैः सततं नेत्र सौख्यदः ॥ ३२२ ॥
उन देवों के निवासों में रात्रि दिन का विभाग नहीं है; क्योंकि वहां पर सूर्य चन्द्रमा नहीं है, किन्तु नेत्रों को सुख देने वाला रत्नों का उत्तम प्रकाश निरन्तर स्रायमान रहता है ।
वर्षातपतुषारादि समयैः परिवजितः ।
सुखद: सर्वदा सौम्यस्तत्र काल प्रवर्त्तते ॥१२॥३२३॥
उन स्वर्गों में वर्षा, शीत, आतप आदिक समय व ऋतुओं से रहित सदाकाल सुख देने वाला सौम्य मध्यस्थ काल ( वसन्त ऋतु) रहता है ।