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________________ । २३२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि द्वीपों के चारों ओर समुद्र, इस प्रकार स्वयम्भूरमरण समुद्र पर्यन्त द्वीप समुद्रों की स्थिति है। द्विगुरगा द्विगुणा भागाः प्रावान्योन्यमास्थिताः । सर्वे ते शुभ नामानो बलयाकार धारिणः ॥३१५।। तब वे द्वीप और समुद्र दुनै-दूने विस्तार वाले हैं तथा परस्पर एक दूसरे को लपेटे हुए हैं; गोलाकार कड़े के प्राकार हैं और उनके नाम भी जम्बूद्वीप, घातकी खंड द्वीप, पुष्कर द्वीप, लवण समुद्र, कालोदधि आदि उत्तमोत्तम हैं। मानुषोत्तर शैलेन्द्रमध्यस्थ मलि सुन्दरम् । भर क्षेत्रं सरिच्छलसुराचल विराजितम् ।।३१६॥ तथा मानुषोत्तर पर्वत के मध्यस्थ नदी पर्वत मेरुपर्वत से अति सुन्दर मनुष्य क्षेत्र है । भावार्थ-सबसे बीच में एक लाख योजन व्यास का जंबूद्वीप है ; जम्बूद्वीप के चारों ओर दो लाख योजन का लवरग समुद्र है। लव समुद्र के चारों तरफ चार. लाख योजन धातकी खंड द्वीप हैं और धातकीखंड द्वीप के चारों तरफ पाठ लाख योजन का कालोदधि समुद्र हैं और कालोदधि समुद्र के चारों तरफ सोलह लाख योजन चौड़ा पुष्कर द्वीप है; पुष्कर द्वीप के उत्तरार्द्ध में अर्थात् अगले भागे के भाग में ८ लाख योजन चौड़ा मानुषोत्तर नाम का दीवार के समान पर्वत पड़ा हुआ है, इस कारण इस द्वीप को पुष्कराद्ध द्वीप कहते हैं। इन अढाई द्वीपों में ही मनुष्य रहते हैं; अगले द्वीपों में मनुष्य नहीं हैं और न उससे आगे मनुष्य जा ही सकते हैं। इसी कारण उस पर्वत का नाम मानुषोत्तर पर्वत है। तत्रार्यम्लेच्छखण्डानि भूरि : भेदानि तेष्वमी । . आर्या म्लेच्छा नराः सन्ति तत्क्षेत्र जनित गुरणः ॥३१७॥ उस मनुष्य क्षेत्र में अर्थात् अढ़ाई द्वीपों में अनेक आर्य खंड और म्लेच्छखंड है, और आर्य क्षेत्रों में आर्य पुरुष और म्लेच्छ क्षेत्रों में म्लेच्छ रहते हैं; उन क्षेत्रों के अनुसार ही उनके गुण आचारादिक हैं; अर्थात् भार्यों के उत्तम श्राचार, उत्तमः गुण हैं, और म्लेच्छों के निकृष्ट प्राचार और धर्मशून्यतादि निकृष्ट गुण हैं। __ क्वचित्कुमानुषोपेतं क्वचिद्व्यन्तर संभृतम् । क्वचिद्भोग धराकीर्ण सरक्षेत्र निरन्तरम् ।।३१।। यह मनुष्य क्षेत्र निरंतर कहीं तो कमानुष कु भोगभूमि सहित है, कहीं व्यन्तर देवों से ..
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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