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अध्याय : पांचवां ]
[ २३१ यद्यपि नरकों में उपयुक्त भूख प्यास की तीवता है, परन्तु न तो किसी काल में तिल मात्र किसी को भोजन मिलता है और न एक विन्दु पानी ही कहीं मिलता है: .. इस प्रकार आतुर हो कर निरन्तर भूख प्यास सहते हैं ।
तिलावष्यति सूक्ष्मारिष कृतखण्डानि निर्दयः । वभिलति वेगेन पुनस्तेषां विधेर्वशात् ॥३१॥
तथा उन नारकीयों के शरीर निर्दय नारकीयों के द्वारा तिल तिल मात्र रखण्ड किये जाते हैं, परन्तु मृत्यु नहीं पाती, तत्काल मिलकर शरीर बन जाता है, इनके ऐसा भी कर्मोदय है, जो मरण नहीं होता; सागरों की वायु पूर्ण होने पर ही मरण होता है। अकाल मृत्यु कभी नहीं होती। .
यातनारुक शरीरायुलेश्या दुःख भयादिकम् । वर्द्धमानं विनिश्चयमधोऽधः श्वभ्रभूमिषु ॥३१२॥
उन नरक की भूमियों में पीड़ा, रोग, शरीर, पायु, लेश्या, दुःख, भय इत्यादि नीचें नीचे बढ़ता हुआ है। अर्थात् पहिले नरक (पृथ्वी) से दूसरे नरक में अधिक है, दूसरे से तीसरे में और तीसरे से चौथे में और चौथे से पांचवे में और पांचवें से छटे में और छठे में सातवे में इस क्रम से अधिक-अधिक है। यह अधोलोक का वर्णन हया ।
* मध्यलोक * मध्यभागस्ततो मध्ये तत्रास्ते झल्लीरीनिमः । यत्र द्वीप समुद्राणां व्यवस्था वलयाकृतिः ॥३१३।।
उस अधोलोक के ऊपर झालर (घंटा बजाने की घड़बली) के समात गोलाकार मध्य लोक का मध्य भाग है, उसमें गोलगोल वलयों (कड़ों) के समान असंख्यात द्वीप समुद्र हैं।
जम्बूद्वीपादयो द्वीपा लवणोदादयोऽर्णवाः। स्वयम्भूरमणान्तास्ते प्रत्येक द्वीप सागराः ॥३१४॥
उस मध्यलोक में जम्बूद्वीपादिक तो द्वीप हैं और लवरा समुद्रादिक समुद्र हैं मो अन्त के स्वयम्भुरमण पर्यन्त भिन्न-भिन्न हैं । भावार्थ---सबके बीच एक लाख योजन चौड़ा लम्बा गोला जम्बुद्वीप है, और उसके चारों को दो लाख योजन के व्यास की खाई के समान लवरण समुद्र है, इसी प्रकार समुद्र के चारों ओर द्वीप और
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