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[ गो: पं. चिन्तामणि
यैः
प्राक्परकलत्रारिंग सेवितान्यात्मवञ्चकः ।
. योज्यन्ते प्रज्वलन्तीभिः स्त्रीभिस्ते ताम्रजन्मभिः ।।३०४ ।।
तथा जिन आत्मवञ्चक पापी जनों ने पूर्व भव में परस्त्री सेवन की हैं, उनको ताम्बे की अग्नि से लाल की हुई स्त्रियों से संगम कराया जाता है । न सौख्यं चक्षुरुन्मेषमात्रमप्युपलभ्यते ।
नरके नारकं दर्निर्हन्यमानैः परस्परम् ||३०||
नरक में नारकी जीव परस्पर एक दूसरे को मारता है, सो वे दिन एक पलक मात्र भी सुख को नहीं पाते ।
किमत्र बहुनोक्तन जन्म कोटि शतैरपि ।
नाशिक
१०९॥
आचार्य महाराज कहते हैं कि कहां तक कहें ? क्योंकि उस नरक में उत्पन्न हुये दुःख को कोटि जन्म लेकर भी कोई कहने को समर्थ नहीं है। हम क्या कह सकते हैं ।
विस्मृर्त यदि केनापि कारणेन क्षणान्तरे । स्मारयन्ति तदास्येत्य पूर्व बेरं सुराधमाः ॥३०७॥ यदि वे नारकी किसी
कारण से क्षण मात्र के लिए भूल जाते हैं तो उसी समय नीच असुर देव आकर उन्हें पूर्व वैर याद करा देते हैं, जिससे फिर वे परस्पर मारपीट करके अपने को महादुःखी कर लेते हैं ।
बुभुक्षा जायतेऽत्यर्थ नरके तत्र देहिनाम् ।
यां न शामयितुं शक्तः पुद्गलप्रत्रयोऽखिलः ॥ ३०८।।
तथा उस नरक में नारकी जीवों को भूख ऐसी लगती है कि समस्त पुद्गलों का समूह भी उसको शमन करने में असमर्थ हैं।
तृष्णा भवति या तेषु वाडवाग्निरिवोल्वणा ।
न सा शाम्यति निःशेष पीतैरण्यम्बुराशिभिः ।।३०६ ।।
तथा नरक में नारकी जीवों के जो तृषा बड़वाग्नि के समान प्रति उत्कट
(तीव्र) होती है सो समस्तं समुद्रों का जल पीले तो भी नहीं मिटती । बिन्दु मात्रं न तैर्वारि प्राप्यते पातुमातुरः ।
तिल मात्रोऽपि नाहारो ग्रसितुं लभ्यते हितैः ॥ ३२० ॥