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अध्याय : पांचवां ।
। २२६ वैकियिक शरीरत्वादि क्रियन्ते यदृच्छया । यत्राग्निश्वापदाङ्ग स्ते हन्तु चित्रर्वधः परान् ।।२९८॥
उन नारकियों का वैक्रियिक शरीर होने के कारण इच्छानुसार पारणी अग्नि हिस्त्र जन्तु सिंहादिक का रूप बनाकर अनेक प्रकार से परस्पर मारने के लिये विक्रिया करते हैं।
न तत्र बान्धवः अनन्तयातना सारे नरकेऽत्यन्त भीषणे ॥२६६।।
यहां अत्यन्त भयानक नरक में न तो कोई बांधव है; न पुत्र है, न कोई स्वामी है, न कोई मित्र है, न कोई भृत्य ही है, न स्त्री है, न पुत्र है, केवल अनन्त यातना का भयानक वृष्टिपात ही है ।
तत्र ताममुखा गृध्रा लोहतुण्डाश्च वायसाः । दारयन्त्येव मर्माणि चञ्चुभिनखरैः खरैः ।।३००॥
उस नरक में मुख - चोंच जिनके ऐसे तो गृध्रपक्षी हैं और लोहे की चोच वाले काक हैं, सो चोंचों से तथा तीक्ष्ण नखों से नारकी जीवों के मर्मों को विदारते हैं।
कृमयः पूतिकुण्डेषु वज्रसूची समाननाः । भित्वा चर्मास्थि मांसानि पिबग्ल्याकृष्य लोहितमम् ।।३०१॥
तथा उस नरक में पीब के कुण्डों में वज्र की सुई समान हैं, मुख जिनके ऐसे कोई वा जौ के नारकी जीवों के चमड़े और हाड, मांस को बिदा कर रक्त (खून) को को पीते हैं।
बलाद्विदाय संदेशर्वदन क्षिप्यते क्षणात् । थिलीनं प्रज्वलत्ताम यैः पीतं मद्यमुद्धतैः ॥३०२।।
तथा जिन पापियों ने मनुष्य जन्म में उद्धत होकर मद्यपान किया है। उनके मुख को संडासी से फाड़ फाड़ कर तुरन्त के पिघलाये हुए ताम्बे को पिलाते हैं ।
परमांसानि यः पापैक्षितान्यतिनिर्दयः। शुलापक्कानि मांसानि तेषां खादन्ति नारकाः ॥३०३॥
और जिन पापियों ने मनुष्य भव में निर्दय होकर' अन्य जीवों का मांस 'भक्षण किया है। उनके मांस के शूले पका पका कर नारकी जीव खाते हैं।