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[ गो. प्र. चिन्तामणि और नरक मंदिर में बसते हैं ।
इति चिन्तानलेनोच्चदहामानस्य ते तदा । धावन्ति. शरशूलासिकराः क्रोधाग्नि दीपित्ताः ॥२६२॥ बरं परावं पापं स्मारयित्वा पुरातनम् । निर्भयं कटुकालापैः पीडयन्त्यति निर्वयम् ॥२६३।३.
इस पूर्वोक्त प्रकार की चिन्तारूप अग्नि से अतिशय जलते हुए नारकी के ऊपर उसी समय अन्य पुराने नारकी बारण, शूल, तलवार लिये हुए, क्रोधरूपी अग्नि से जलते हुए दौड़ते हैं और पूर्व के पाप तथा वैर को याद कराते हुए कटु वचनों से तिरस्कार करके उसे अतिनिर्दयता से जिस प्रकार बनता है, दुःख देते हैं ।
उत्पादयन्ति नेत्राणि चूर्णयन्स्यस्थि संचयम् । बारयन्त्युदरं कशास्त्रोटयन्यत्र मालिकाम् ।।२६४॥ ।
वे पुराने नारकी उस विलाप करते हुए नये नारकी के नेत्रों को उखाड़ते हैं, हड्डियों को चूर्ण कर टालते हैं. सदर को फाड़ते हैं और क्रोधी होकर उसकी प्रांतों को तोड़ डालते हैं। .
निष्पीडयन्ति यन्त्रेषु दलन्ति विषमोपलैः ।
शाल्मलीधु निघर्षन्ति कुम्भीषु क्वाथयन्ति च ।।२६।।
तथा वे नारकी उसे धानी में डाल कर पीलते हैं और कठिन पाषाणों से दलते हैं, लोहे के कांटे वाले वृक्षों से घिसते (रगड़ते) हैं तथा कुम्मियों में (कलशियों में) डालकर काढा करते (उबालते) हैं ।
असह्यदुःख सन्तान दान दक्षाः कलिप्रियाः । तीक्षपदंष्ट्रा करालास्या भिन्नाञ्जन समप्रभाः ॥२६६॥ . कृष्णलेश्योद्धताः पापा रौद्र ध्यानक भाविताः। . भवन्ति क्षेत्र दोषेण सर्वे ते नारकाः खलाः ॥२६७।।
तथा वे नारकी असह्य दुःखों की निरन्तरता देने में चतुर हैं, कलह. करना ही जिनको प्रिय है, तीक्ष्ण दाढों से भयानक मुख वाले हैं, बिखरे हुए काजल के समान जिनके शरीर की काली प्रभा है ; तथा कृष्णलेश्या के कारण उद्धत हैं, पापरूप हैं और रोद्रध्यान के भावने वाले हैं, एवं क्षेत्र के दोष से वे सब ही नारकी दुष्ट होते हैं।
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