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________________ . अध्याय : पांचवां । [ २२७. फिर विचारता है कि जो अधम (पापी) पुरुष जिह्वा उपस्थेन्द्रिय से दण्डित होते हैं, वे ऐसा कर्म करते हैं कि जिस कर्म से वे पापी पीडित होकर नरकों में पचाये जाते हैं, रोते हैं वा शब्द करते हैं; जिसको सुनने से अन्य को दया उपज श्रावें। Ca चक्षुरुन्मेषमात्रस्य सुखस्यार्थे कृतं मया । तत्पापं येन सम्पमा अनन्ता बुःखराशयः ॥२७॥ फिर विचारता है कि मैंने नेत्रों के टिमकार मात्र सुख के लिये ऐसा पाप किया कि जिससे अनन्त दुःखों की राशि प्राप्त हई। याति सार्द्ध ततः पाति करोति. नियतं हितम् । : हन्ति दुःखं सुख दत्ते यः स बन्धनी योषितः ॥२८॥ फिर विचारता है कि यह धर्मरूप बन्धु (हित). ऐसा है कि साथ जाता है और जहां, जाता है, वहीं रक्षा करता है और यह मित्र नियम से हित ही करता है, दुःख का नाश करके सुख देता है। ऐसे धर्मरूपी मित्र को मैंने पोसा ही नहीं और जिनको मित्र समझ के पोसा उनमें से कोई एक भी साथ नहीं पाया। परिग्रह महाग्राह संग्रस्ते नातं चेतसा । . न दृष्टा यम शार्दुल चपेटा जीवनाशिनी ॥२६॥ फिर विचारता है कि परिगंहरूपी महाग्राह से पकड़े हुए पीडित चित्त होकर मैंने जीव को नाश करने वाली यमरूपी शार्दूल की चपेट नहीं देखी अर्थात् परिग्रह में ग्यासक्त होकर निरन्तर पाप ही करता रहा । पातयित्वा महाधोरे मां श्व ऽचिन्त्यवेदने । क्व गतास्तेऽधुना पापा मद्वित्तफल भोगिनः ॥२६॥ फिर विचारता है कि जो कुटुम्बादिक मेरे उपार्जन किये हुये धन के फल भोगने वाले थे, वे पापी मुझे अचिन्त्य वेदनामय इस घोर नरक में डाल कर अब कहां चले गये ? यहां दुःख में कोई साथी न हुआ। . .. इत्यजस्त्रं सुदुःखार्ता विलापमुखराननाः। शोचन्ते पाप कर्माणि वसन्ति नर कालये ।।२९१॥ . इस पूर्वोक्त प्रकार से नारकी जीव निरन्तर महादुःख से पीडित हुप, मुख से पुकारते हुए, विलाप करते हुए. अपने पापकार्यों को स्मरण कर करके शोच करते हैं . RKHESAR 35 .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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