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________________ २२६ । [ गो. प्र. चिन्तामगि न दृश्यन्ते ते मृत्या न पुत्रा न च बान्धवाः । येषां कृते मया कर्म कृत स्वस्यैव धातकम् ।।२८०॥ न लगाणि मित्राणि न पाप प्रेरको जतः । पदमब्येतमायातो मया साद्ध गतमपः ॥२१॥ फिर ऐसा विचारता है कि जिनके लिए मैंने अपने घातक पापकर्म पूर्व जन्म में किये इस समय न तो वे चाकर, न पुत्र, कलत्र, मित्र मण पाप में प्रेरणा करने वाले बांधव कोई देखने में आते हैं । बे ऐसे निर्लज्ज हो गये कि एक कदम भी मेरे . साथ नहीं पाये। श्राश्रयन्ति यभा बुक्षं फलितं पत्रिणः पुरा । फलापाये पुनर्यान्ति तथा ते स्वजना गताः ।।२८२॥ फिर ऐसा विचारता है कि जिस प्रकार पक्षी पहिले तो फले हुए वृक्ष का ... ग्राश्रय करते हैं, परन्तु फलों का अभाव हो जाता है, तब-तव पक्षी उड़ जाते हैं, उसी प्रकार मेरे स्त्रजन जाते रहे, ये दुःख भोगने को कोई साथ नहीं आया । शुभाशुभनि कर्माणि यान्त्येव सह देहिमिः । स्वाजिता नीति यत्प्रोचुः सन्तस्तत्सत्यतां गतम् ॥२८३॥ फिर विचारता है कि जो सत्पुरुष कहते थे कि अपने उपार्जन किये हुए शुभ अशुभ कर्म हैं, वे ही जोष के साथ जाते हैं, अन्य कोई साथ नहीं जाता सो वह आज सत्य प्रतीत हुआ। धर्म एव समुद्धतुं शक्तोऽस्माच्छ्चभ्रसागरात् । नस स्वप्नेऽपि पापेन मया सम्यक्पुराजितः ॥२४॥ फिर विचारता है कि इस नरकरूपी समुद्र से उद्धार करने के लिये एक धर्म ही समर्थ है; परन्तु मुझ पापिष्ठने पहिले स्वप्न में भी उसका उपार्जन किया। सहायः कोऽपि कस्यापि नाभून्न च भविष्यति । मुक्तवक प्राकृतं कर्म सर्वसत्वाभिनन्दकम् ॥२८॥ फिर विचारता है कि इस संसार में कोई किसी का सहायक न है, न हुआ और न होगा; किन्तु समस्त जीवों को आनन्द करने वाला अर्थात् जिसमें सब की दया हो ऐसा शुभ कर्म ही सहायक होता है । तत्तुर्वन्त्यमाः कर्म जिह्वोपस्थादि दण्डितः । येनत्वभ्रषु पच्यन्ते कृतात करुख स्वनाः ॥१८६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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