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अध्याय : पांचवां ]
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हित साधन नहीं किया तो अब यहां देव और पौरुष दोनों से रहित होकर क्या कर सकता हूं, यहां कुछ भी हित साधन नहीं हो सकता ।
यदान्धेनापि पापेन निस्त्रि शेवास्त बुद्धिना |
विराध्या राज्य सन्तानं कृतं कर्माति निन्दितम् ।।२७४ ।।
फिर विचारला है कि मद से थे पापी निर्दय नष्ट बुद्धि मैंने ग्राराधने योग्य जो भले मार्ग में प्रवर्तनेवाले उन पूज्य पुरुषों के सन्तान को विराधकर निंदनीय कर्म किया।
यत्पुरग्राम विन्ध्येषु मया क्षिप्तो हुताशनः । जल स्थल बिलाकाश चरिणो जन्तवो हताः ।।२७५ ।। कृन्तन्ति मम मर्माणि स्मर्यमाणान्य तारतमं । प्राचीतान्यद्य कर्माfरण कचानीय निर्दयम् ॥ २७६॥
फिर विचारता है कि मैंने पूर्व भव में पुर ग्राम वन में ग्रग्नि डालकर दब लगाई और जल भर, थल भर आकाश भर तथा बिलों में रहने वाले असंख्य जीवों को मारा, वे पूर्व के पापकर्म इस समय स्मरण आने से निरन्तर मेरे मर्म स्थानों को दया रहित करवत के समान भेदते हैं ।
किं करोमि क्व गच्छामि कर्मजाते पुरः स्थिते ।
शरणं कं प्रपश्यमि वराको देव वन्चितः ॥ २७७ ॥
फिर विचारता है कि ऐसे नरकों के दुःख में भी कर्मों का समूह मेरे सामने है, उसके होते हुए मैं क्या करूँ, कहां जाऊँ, किसकी शरण देखूं, मैं एक दैव सेठमा हुआ है, मुझे कुछ भी सुख का उपाय नहीं दिखता ।
यत्रिमेष मपि स्मर्तु द्रष्टुं श्रोतुं न शक्यते ।
तद्दुः खभग सोढव्यं वर्द्धमानं कथं मया ॥२७८
फिर विचारता है कि नेत्र के टिमकार मात्र भी जिसके स्मरण करने व
सुनने की समर्थता नहीं प्रतिक्षण बढ़ता हुआ वह दुःख मैं कैसे सहूँगा । विषज्वलन संकीर्ण वर्द्धमानं प्रतिक्षणम् ।
मम मूनि विनिक्षिप्तं दुःखं देवेन निर्दयम् ॥१२७॥
फिर विचारता है कि त्रिष तथा अग्नि से व्याप्त क्षरण क्षरण में बढ़ने वाले ये
सब दुःख दैव (कर्म) ने दया रहित होकर मेरे ही माथे पर डाले हैं ।