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________________ ..:.:. २२४ } [ गो. प्र. चिन्तामणि अविद्याक्रान्तचित्तेन विषयान्धीकृतात्मना । चरस्थिरानि संघालो निर्दों हतो मया ॥२६७॥ फिर नारकी विचारता है कि अविद्या से आक्रान्त है चित्त जिसका तथा विषयों से ग्रंधा होकर मैंने उस स्थावरों के समूह को मारा है। परबिलामिषासक्तः परिस्त्रीसंग लालसा ।। बहुव्यसन विध्वस्तो रौद्ध. ध्यान परायणः ॥२६॥ बत स्थितः प्राक् चिरं का सत्यैतत्फल भागतम् । अन्तयातनासारे दुरन्ते नरकार्णवे ॥२६६।। नारकी फ़िर पश्चाताप करता है कि मैं परके धन में और मांस में अथवा पर के धनरूपी मांस में, आसक्त होकर पर स्त्री संग करने में लुब्ध हुअा तथा बहुत प्रकार के व्यसनों से पीड़ित होकर रौद्र ध्यानी हुया, पूर्व जन्म में इस प्रकार रहा इस कारमा उसका यह अनन्त पीड़ा से असार-अपारं नरकरूपी समुद्र फल पाया है ।. यन्मया वञ्चितो लोको बराको गढमानसः । उपायहुभिः पापैः स्वाक्ष सन्तर्पणाथिना ॥२७०॥ कृतः परामदों येषां धनमूस्त्री कृते मया । धातश्म तेऽत्र संप्राप्ता: कई तस्माय निष्क्रियाम् ।।२७१॥ फिर विचारता है कि मैंने भोले जनों को अति अन्यायरूप उपायों से इन्द्रियों को पोषने के लिए ठगा तथा पर का धन पर की भूमि वा स्त्री लेने के लिए जिनका अपमान किया तथा द्यात किया । लोग यहां नरक भूमि में उसका दंड देने के लिये आकर प्राप्त हुए हैं। ये तदा शशकप्राया मया बलवता हताः । तेऽध जाता मृगेन्द्राभा मां हन्तु विविधर्वधैः ।।२७२।। उस मनुष्य भव में जब मैं था तो वे शशक (खरगोश) समान थे और मैं बलवान् था सो मैंने मारा किन्तु वे आज यहां पर सिंह के समान होकर अनेक प्रकार ..के घातों से मुझे मारने के लिए उद्यत हैं। मानुष्येऽपि स्वतंत्रेण यत्कृतं नात्मनो हितम् । तदद्य किं करिष्यामि देवपौरुष वजितः ।।२७३॥ फिर विचारता है कि जब मनुष्य भव में स्वाधीन था। तब भी मैंने अपना KAREER
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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