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श्रध्याय: पांचवां ]
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तत्पश्चात् नारकी जीवों के दुःसह पश्चाताप अतिशय करके प्रगट होता है । बहादुःसह पश्चाताप वज्राग्नि के समान निर्दय हो चित्त को दहन करता हुआ प्रगट हुआ है ।
मनुष्यत्वं समासाद्य तदा कैश्चिन्महात्मभिः । श्रपवर्गाय संविग्नैः सम विषया रामपाकृत्य विध्याप्य मदनानलम् । श्रप्रमत्तस्तपश्चरणं धन्यैर्जन्माति शान्तये ॥२६२॥ उपसर्गाग्निपातेऽपि धैर्य मालस्य चोन्नतम् । तैः कृतं तदनुष्ठानं येन सिद्ध समीहतम् ॥ २६३॥ प्रमादमदमुत्सृज्य भाव शुद्धयां मनोषिभिः । केनाप्य चिन्त्यवृत्तेन स्वर्गो मोक्षच्च सघितः ॥ २६४॥ शिवrigiri मार्ग विशन्तोऽप्यतिवत्सलाः ।
मया बोरताः सन्तो निर्मत्स्यं कटुकाक्षरैः ।। २६५ ।।
कितने बड़े पुरुषों ने मनुष्यत्व पाकर वैराग्य सहित हो मोक्ष के लिये पूजनीय पवित्रा• चरण किया और उन महाभागी मुनियों ने विषयों की याशा को दूर करके कामरूप 1. अग्नि को बुझाकर निम्प्रमादी हो संसार पीड़ा की शांति के लिये तप का संचय किया । तत्पश्चात उन उत्तम पुरुषों ने उपसर्गरूपी अग्नि के थाने पर बड़े धैर्य का आलंबन कर वह प्राचरण किया कि जिससे वांछित कार्य सिद्ध हुआ तथा उन बुद्धिमान पुरुषों ने प्रमाद और मद को छोड़कर भाव की शुद्धता से किसी प्रचित्य याचरण से स्वर्ग 'तथा मोक्ष साधा, उन सत्पुरुषों ने वात्सल्य भाव से युक्त हो मुझे मोक्ष और स्वर्ग यादि के मार्ग का उपदेश दिया, परन्तु मैंने बड़े कटु अक्षरों से उनका तिरस्कार करके निंदा की उनका उपदेश अंगीकार किया, इत्यादि पश्चाताप करते हैं।
तस्मिन्नपि मनुष्यत्वे परलोकैक शुद्धि |
ar तत्संचितं कर्म यज्जातं श्वभ्रशं बम् ॥ २६६॥
फिर भी नारकी पश्चाताप करता है कि परलोक की अद्वितीय शुद्धता देने वाले उन मनुष्य भव में भी मैंने वह कर्म संचय किया कि जिससे नरक का शंबल ( प राह खर्च ) अर्थात् उस कर्म ने सहज में हो नरक में ला पटका 1