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[ गो. प्र. चिन्तामगिः उस नरक भूमि में कोई सुजन बा मित्र वा बाँधव नहीं है, सभी निर्दय, पापी, क्रूर और भयानक प्रचण्ड शरीर वाले हैं।
सर्वे च हुण्ड संस्थानाः स्फुलिङ्गः सदृशेक्षणः । विद्धिता शुभ ध्यानाः प्रचण्डाश्चण्ड शासनाः ।।२५५।।
बे सभी नारकी जीव हुँइक संस्थान वाले हैं अर्थात् जिनके शरीर का प्रत्येक अंग अति भयानक बेडौल है और अग्नि के स्फुलिंग के समान जिनके नेत्र हैं तथा प्रचण्ड, ग्वार्ता सैद्र ध्यान को बढ़ाये हुए है, तथा लोधी हैं और जिनका शासन भी प्रचण्ड है।
तत्राकन्दर ः सा भू यन्ते कर्कशा: स्वनाः । दृश्यन्ते गृधगोम्थुसर्पशादल मण्डलाः ।।२५६।।
उस नरक भूमि में चारों ओर से पुकारने के शब्द बड़े कर्कश सुने जाते हैं, तथा गृधपक्षी, सिवाल, सर्प, सिंह, कुत्ते ये सब जीव बड़े भयानक दीखते हैं।
घायन्ते पूतयों गन्धाः स्पृश्यन्ते वज्र कण्टकाः। .. . जलानि पूति गन्धीनि मधोऽसृग्मांस कर्दमाः ॥२५७॥
जिस नरक भूमि में दुर्गध सूचनी पड़ती हैं और मजमय कांटों में छिदना पड़ता है और जल जहां दुर्गन्धमय है, और रुधिर मांस का है कादा जिनमें ऐसी नदियाँ हैं।
चिन्तयन्ति तदालोक्यं रौद्ध मत्यन्त शङ्किताः । केयं भूमिः क्व चानीताः के वयं केन कर्मणा ॥२५॥
उस स्थान को रौद्र (भयानक ) देखकर वे नारकी गरग (जो नवीन उत्पन्न हुए हैं) अत्यन्त शंकित होकर विचरते हैं कि यह भूमि कौनसी हो और हम कौन हैं कौन से कर्म से यहां आये हैं। .. ..
ततो बिविभडात्स्वं पतितं श्वभ्रसागरे कमगाऽत्यन्तरौद्र र हिमाद्याम्भ जन्मना ।।२५६।।
तत्पश्चात विभङ्गावधि (कुअंबधिज्ञान) से जानते हैं कि हिंसादिक प्रारम्भों से उत्पन्न हुए अत्यन्त रौद्र (खोटे) कर्म से हम नरक रूपी समुद्र में पड़े हैं। .
ततः प्रादुर्भवत्यच्चैः पश्चातापोऽस्ति दुःसहः । . दहन्न विरलं चेतो वनाग्निरिव निर्दयः ।।२६०॥
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