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अध्याय पांचवां ]
शिवाश्वव्याघ्रकङ्कादये वकण्टक संकीखें
संभूय कोटिकामध्ये ऊर्ध्वपादा श्रद्योभुरवाः ।
ततः पतन्ति सानन्दं वज्रज्वलन भूतले ॥ २५० ॥
मांसाशिविहगान्विते । शूलशाल्मलिदुर्गमे ॥ २४६॥
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नरक कैसे हैं? कि असिपत्र (तलवार) सरीखे हैं पत्र जिनके ऐसे वृक्षों से तथा शूल तलवार यादि शस्त्रों से व्याप्त हैं प्रत्यन्त दुर्गन्ध युक्त हैं वसा ( श्रपकमास ) afrर और कीटों से भरा हुआ कर्दम हैं जिनमें ऐसे हैं तथा सियाल पचान आदिक से तथा मांस भक्षी पक्षियों से भरे हुए हैं, तथा वज्र भय कांटों से और शूल शाल्मलि आदि से दुर्गम हैं अर्थात् जिनमें गमन करना दुःख दायक हैं ऐसे नरकों में बिलों के संपुट में उत्पन्न होकर वे नारक जीव ऊँचे पांत्र और नीचे मुख ऐसे चिल्लाते हुए उन मंपुटों से वाग्निमय पृथ्वी में गिरते हैं ।
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श्रयः कण्टक कीर्णासु द्रुत लोहाग्निवीथिषु ।
छिन भिन्न विशोङ्गा उत्पतन्ति पतन्ति च ।। २५१||
उस नरक भूमि में वे नारकी जीव छिन्न भिन्न खंड-खंड होकर बिखेरे हुए अंग से पड़कर बार-बार उछल उछल के गिरते हैं, सो कैसी भूमि में गिरते हैं कि जहां पर लोहे के कांटे बिखरे हुए हैं और जिनमें लोहा गल जाता है ।
दुःसहा निष्प्रतीकारा ये रोगाः सन्ति केचन ।
साकल्येनैव गात्रेषु नारकारणां भवन्ति च ॥ २५२॥
जो रोग सह्य हैं जिनका कोई उपाय ( चिकित्सा) नहीं हैं ऐसे समस्त प्रकार के रोग नरकों में रहने वाले नारकी जीवों के शरीर के रोम-रोम में होते हैं ।
न तत्र सुजनः सर्वे ते निर्देयाः
अष्ट पूर्व मालोक्य तस्य रौद्रः भयास्पदम् !
दिशः सर्वाः समीक्षन्ते वराकाः शरणार्थिनः ॥ २५३॥
फिर वे नारकी जीव उस नरक भूमि को अपूर्व और रौद्र ( भयानक ) देखकर किसी की शरण लेने की इच्छा से चारों तरफ देखते हैं, परन्तु कहीं कोई सुख का कारण नहीं दिखता और न कोई शरण ही प्रतीत होता है ।
कोऽपि न मित्रं न च बान्धवाः ।
पापाः क्रूरा भीमोग्रविग्रहाः ॥ २५४ ॥