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[ गो. न. चिन्तामणि उन सप्त नरक की पृथ्बियों में कई तो बञाग्नि के समान उष्ण हैं, कई शीत उष्णता से व्याप्त हैं और कई अत्यन्त हिमवाली हैं इस प्रकार अतिशय भयकारक है। उन नरकों में शीत. उष्ण की बाधा
उदीरनिलदीप्तासु निसर्योष्णासु · भूमिथु ।
मेरुमात्रोऽप्ययः पिण्डः क्षिप्तः सद्यो विलीयते . ।।२४४॥ . .. उदय रूप है अग्नि जिनमें ऐसी स्वाभाविक उप्परूप भूमियों में यदि मेरु पर्वत के समान लोहे का पिंड डाला जाय तो तत्काल गल कर भस्म हो जाय ऐसी उन भूमियों में उगता है।
शीत भूमिध्वपि प्राप्तो मेरु मानोऽपि शीर्यते । शातधा साक्यः पिण्डः प्राप्य भुमि क्षरणान्तरे ॥२४॥
जिस प्रकार उघ्रय भूमियों में मेरु समान लोहे का पिड गल जाता है, उसी प्रकार शीत प्रधान भूमियों में भी मेक के समान लोहे का पिड डाला जाय तो शीत के कारण क्षण मात्र में खंड-खंड होकर बिखर जायेगा। उन नरकों के जीव---.
हिसास्तेयानृता ब्रह्म ब्रह्वार भादि पासकैः । विशन्ति नरकं घोरं प्रणिनोऽन्तनिर्छयाः ॥२४६॥
उन घोर नरकों में हिंसा झूठ चोरी कुशील और बहुत प्रारंभ परिग्रहादि पापों के करने से ही अत्यन्त निर्दयी जीव प्रवेश करते हैं। भावार्थ-~-हिंसादि पांच पाप अथवा सात व्यसनों के सेवी जीव ही उन घोर नरकों में जाकर दुःख भोगते है।
मिथ्यात्वाविरति क्रोध रौद्र ध्यान परायणाः । पतन्ति जन्तवः श्वने कृष्ण लेश्या वशं गताः ।।२४७॥
तथा मिथ्यात्य अविरति क्रोध रौद्रध्यान में तत्पर तथा कृष्ण लेश्या के वंश हुए प्राणी नरक में पड़ते हैं। उन तरकों में बुःख
असि पत्रचनाकोणे. शस्त्र.. शूला सिसंकुले । नरकेऽत्यन्तदुर्गन्धे .. वसासक् . . कृमिकर्दमे ॥२४८।।
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