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. अध्याय : पांचवां ।
[ २१६ राहत पाकाश में अपने शरीर को विस्मृत किये स्थित हैं।
घनाब्धि बलये लोकः स च नान्ते व्यवस्थितः । तनवातान्तरे सोऽपि स चाकाशे स्थितः स्वयम् ॥२३६।।
यह लोक तो धनोदधि नाम के बात बलय में स्थित है. और धनोदधि वात वलय धनवात बलय के मध्य में है। अर्थात् धनोदधि वातवलय के चारों ओर धनवात वलय घिरा हुआ है, और धनवातवलय के चारों तरफ तनुवातवलय घिरा हा है और तनुवात वलय आकाश में स्वयमेव स्थित है। इसमें किसी का कोई कर्तव्य नहीं है । अनादि काल से इसी प्रकार की व्यवस्था है । .. अधो वेत्रासना कारो मध्ये स्याज्झल्लरीनिभः ।
मुबला मस्ततोव्यूज़ स विधेति व्यवस्थितः ।।२४०।।
यह लोक नीचे से तो वेत्रासन कहिये मोहे के आकार का है अर्थात् नीचे से चौड़ा है फिर घटता-घटता मध्य लोक पर्यन्त सँकड़ा है फिर मध्य लोक मालर के प्राकार का है और उसके ऊपर ऊर्ध्व लोक मृदंग के आकार का है अर्थात् बीच में कुछ चौड़ा है ऐसे तीन प्रकार के लोक की व्यवस्था है ।
___ अस्य प्रमाण मुन्नात्या सप्त च रज्जवः । .... सप्लैका पञ्च चैका च मूल मध्यान्त विस्तरे ॥२४१।।
इस लोक की ऊंचाई तो सात-सात राजू है अर्थात् नीचे से लगाकर मध्य लोक पर्यन्त सात राजू है और उससे ऊपर राजू है इस प्रकार चौदह राजू ऊंचा है, और मूल में चौड़ा सात राजू है, सो घटता-घटता मध्य. लोक में एक राजू चीड़ा है और उसके ऊपर बीच में पांच राजू चौड़ा है और अन्त में और आदि में मध्य लोक के निकट एक-एक राजू चौड़ा है। अधोलोक
तत्रायो भागमासाद्य संस्थिताः सप्त भूमयः । यासु नारकपण्ढानां निवासः सन्ति भीषरणाः ॥२४२।।
इस लोक के अधोभाग में सातः पृथ्वि हैं जिनमें नारकी नपुंसक जीवों के बड़े भयकारी निवास स्थान हैं।
काश्चिन्दनानलप्रख्याः काश्चिच्छीतोष्रंगसंकुलाः । तुषार बहुलाः काश्चिद् भूमयोऽत्यन्त भीतिदाः ॥२४३३॥
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