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.. चिन्तामरिण लोक का स्वरूप
स्थित्युत्पत्तिव्ययोपेतः पदार्थ श्चेतनेतरैः ।
सम्पूर्णोऽनदि संसिद्धः कर्तुत्रापार बजितः ॥२३४।।
__ यह लोक बौव्य उत्पाद और व्यय (क्षय) करके संयुक्त चेतन अचेतन पदार्थ से सम्पूर्ण तथा भरा हुआ है और अनादि संसिद्ध है, कर्ता के व्यापार से वजिल है, अर्थात् कोई अन्यमती इस लोक का कर्ता हा ईश्वर आदि को कहते हैं तथा कच्छप या शेष नाग के ऊपर स्थित है, इत्यादि बुद्धि कल्पित असत्यार्थ कल्पना करके कहते हैं, सो वैसा नहीं है; सर्वज्ञ ने जैसा कहा है वैसा ही सत्य हैं।
ऊधिोमध्न भागों बिभर्ति भुवनत्रयम् । अतः स एवं सूत्रस्त्र लोक्याधार इष्यते ॥२३५॥
तथा यह लोक उर्ध्व, मध्यं अधोभाग से तीन भुवनों को धारण करता है, इस कारण सूत्र जानने वाले तीन लोक (तीन जगत) का प्राधार इस लोक को कहते हैं।
उपयु परि संक्रान्तः सवतोऽपि निरन्तरः । चिमिर्वायुभिरा कोषों महावेग संहाबलः ।।२३६।।
तथा यह लोक उपरि उपरि (एक के ऊपर एक) सर्व तरफ से ग्रन्तर रहित महावेगवान महाबल वाले तीन पवनों से बैठा हुआ है । तीनों पवनों के नाम---
घनाब्धिः प्रथमस्तेषां ततोत्तयैव घनमारूतः । सनुवात स्तृतीयोऽन्ते विजेयावायवः क्रमात ॥२३७।।
उन तीन पवनों में से प्रथम तो यह लोक धनोदधि नाम पचन से बढ़ा हुआ है, उसके ऊपर धनवात नाम का पवन बेढ़ा हुआ है और उसके ऊपर अन्त में तनुवांत नाम का पवन है, इस प्रकार तीन. पवनों से लोक बेढ़ा हुआ हैं। इसी कारण उधर
इधर हट नहीं सकता किन्तु, अाकाश के मध्य भाग में स्थित है। ... प्रत्येक पवन २०-२० बीस-बीस हजार योजन मोटा है
उद्धत्य सकलं लोकं स्वशत्तयैव वयवस्थिताः । पर्यन्त रहिते ज्योम्नि मरुतः प्रांशु विग्रहाः ।।२३।। और ये तीनों पवन तीन लोकों को धारण करके अपनी शक्ति से ही अन्तर