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अध्याय : पांचवां ]
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इत्थं कर्मकटुप्रपाक फलिताः संसार घोराचे । जीबा दुर्गति दुःख वाढव शिखा सन्तान संतापिताः ॥ मृत्युत्पत्ति महोमिजाल निचिता मिथ्यात्व वातेरिताः । क्लिश्यन्ते तदिदं स्मरन्तु नियतं धन्याः स्वसिद्धयथिनः ॥ २३२॥
इस प्रकार भयानक संसार रूप समुद्र में जो जीव हैं वे ज्ञानवरदिक कर्मों
कटु पाक (तोदय से संयुक्त हैं । वे दुर्गति के दुःख रूपी बडवानल की ज्वाला - से संतान से संतापित हैं तथा मरण जन्म रूपी बड़ी लहर से परिपूर्ण भरे हैं तथा मिथ्यात्व रूप पवन के प्रेरे हुये कुलेस भोगते हैं, सो जो धन्य पुरुष हैं, वे अपनी मुक्ति की सिद्धि के लिए इस प्रकार विपाक विचय ध्यान का स्मरण करें ( ध्यावें ) ।
इस प्रकार विपाक विचय ध्यान का वर्खेन किया इसका संक्षेप यह है कि ज्ञानावरणादि कर्म जीवों के अपने तथा पर के निरन्तर उदय से आते हैं, सो यह विपाक है, इसको चिन्तवन करने से परिणाम विशुद्ध हो जाने पर कर्मों के नाश करने का उपाय करें तब मुक्त होता है 1.
* संस्थान-विचय-धर्मध्यान *
संस्थान विचय धर्मध्यान का स्वरूप
आगे संस्थान विचय नामक धर्म ध्यान के चौथे भेद का वर्णन करते हैं, इस ध्यान में लोक का स्वरूप विचार किया जाता है, इस कारण लोक का वर्णन किया जाता है ।
श्रनन्तानन्तमाकाशं सर्वतः स्वप्रतिष्ठितम् ।
तन्मध्येsयं स्थितो लोकः श्रीमत्सर्वज्ञवरितः ॥२३३॥ .
प्रथम तो सर्व तरफ ( चारों ओर ) अनन्तानन्त प्रदेश रूपं आकाश है, सो
क्योंकि उससे बड़ा अन्य
हस्त्र प्रतिष्ठित है, अर्थात् श्राप ही अपने आधार पर है, कोई पदार्थ नहीं है जो उसका आधार हो । उस श्राकाश मध्य (बीच ) में यह लोक स्थित है सो श्रीमत्सर्वज देव ने वर्णन किया है, इस कारण प्रमाणभूत है क्योंकि असत्य कल्पना करके अन्य किसी ने नहीं कहां सर्वत्र भगवान् ने प्रत्यक्ष देख कर जैसा है वैसा ही वर्णन किया है ।