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________________ २१६ ] [ गो, प्र. चिन्तामणि मन्द वीर्यारिण जायन्ते क ण्यति बालान्यपि । अपक्वपाचना योगार फलानीव वनस्पतेः ॥२२७॥ पूर्वोक्त अष्टकर्म अतिशय वलिष्ठ हैं तथापि जिस प्रकार बनस्पति के पालन बिना पके भी पवन के निमितं (पाल आदि) से पक जाते हैं, उसी प्रकार इन कीं। की स्थिति पूरी होने से पहिले भी तपश्चररादि से मन्द वीर्य (अल्प फल देने वाले हो जाते हैं। अपकवः क्रियतेऽस्ततन्दैस्तपोभिग्नेवर शुद्धि युक्तः । क्रमाद् गुरपथ रिंग समाश्रयेण सुसंवृतान्तः करणे मुनीन्द्रः ।।२२८॥ नष्ट हुअा है प्रमाद जिनका और सम्यक प्रकार से संवर रूपं हुआ है चिनः । जिनका ऐसे मुनीन्द्र उत्कृष्ट विशुलता सहित तापों से इनु पर. हे गुणश्रेणी निर्जरा को ।। आश्रय करके विना पके कर्मों को भी पका कर स्थिति पूर्ण हुए बिना ही निर्जरा - करते हैं। द्रव्याधुत्कृष्ट सामग्रीमासाद्योग्रतपोबलात कर्माणि घातयन्त्युच्चेस्तुर्य ध्यानेन योगिनः ॥२२६॥ योगीश्वर द्रव्य क्षेत्र काल भाव की उत्कृष्ट सामग्री को प्राप्त होकर तीन तप के बल से इस विपाक विचय नामा ध्यान के पश्चात् चौथे संस्थान विचय नाम ध्यान से कर्मों को अतिशयता के साथ नष्ट करते हैं। विलीना शेष कर्माणि स्फुरन्तमति निर्मलम् । स्वं ततः पुरुषाकरं स्वाङ्गमर्यगतं स्मरेत् ।।२३०॥ उक्त विधान से कर्मों की निर्जरा से वलय हुए हैं समस्त कर्म जिसके ऐसा. स्फुरायमान निर्मल पुरुषाकार स्वरूप अपने अंग में ही प्राप्त हुए यात्मा को स्मरण र करते हैं । अर्थात् चिन्तवन (ध्यान) करते हैं। इति विविध विकल्पं कर्म चित्र स्वरूपं । प्रति समय मुयोर्ण जन्म वयंङ्ग भाजाम् ॥ स्थिरचर विषयाएवं भावयन स्ततन्दो । दहति दुरित कक्षं संयमो शान्त मोहः ॥२३१।। पूर्वोक्त प्रकार अनेक हैं भेद (विकल्प) जिसमें ऐसे कर्म स्वरूप संसार में वर्तने वाले प्राणी स्थावर असों के समय-समय प्रति उदयरूप हैं, उसको शान्त मोह संयमी मुनि प्रमाद रहित होकर विचारता हुआ पाप रूपी बन को दग्ध करता है ।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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