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________________ अध्याय: पाँच | [ २१५ नराशुषः कर्म विपाक योगासरत्व मासाद्य शरीर भाजः 1 सुखासुखा कान्तधियो नितान्त नयन्ति कालं बहुभिः प्रपञ्चः ॥ २२१॥ तथा प्राणी मनुध्यायु नामा कर्म के उदय भोग से मनुष्यत्व को पाकर 'कुछ सुख दुःख से व्याप्त है बुद्धि जिसकी ऐसे हो नाना प्रकार के प्रपञ्चों ( कार्यों ) से काल यापन करते हैं । चर स्थिर विकल्पासु तिर्यग्गतिषु जन्तुभिः । तिर्यगायु प्रकोपेन दुःख मेवानुभूयते ॥२२२॥ तथा प्राणो तिर्यञ्च गतियों में उत्पन्न होकर केवल दुःख ही दुःख भोगते हैं । नारकायुः प्रकोपेन नरकेऽचिन्त्यवेदने । forefङ्कन स्तूर्णं कृताति करुण स्वना ॥२२३॥ तथा नारकीयु कर्म के उदय से प्राणी प्रचिन्त्य वेदना वाले नरकों के बिलों में जिनके सुनने से कमरा हो आवे ऐसे शब्द करते हुए उत्पन्न होते हैं और पांच प्रकार के दुःख भोगते हैं । नाम कर्मेदयः साक्षादले चित्राण्यनेकधा । नामनि गतिजात्यदि विकल्पामोह देहिनाम् ॥ २२४ ॥ तथा जीवों को नाम कर्म का उदय अनेक प्रकार के गति जाति यादि भेद वाले नामों को साक्षात् वारण करता है, नामकर्म की २३ प्रकृतियों का नाम लक्षणादि विशेष भेद गोमटसार ग्रंथ से जानना । गोत्रास्यं जन्तु जातस्य कर्म दत्ते स्वकं फलम् । शस्ता शस्त्रेषु गोत्रेषु जन्म निष्पाद्य सर्वथा ॥२२५॥ तथा गोत्र नाम कर्म जीवों कर सर्व प्रकार से अपना फल देता है । के समूह को ऊच नीच गोत्र में उत्पन्न निरुभिः स्वसामर्थ्याद्यानला भादिपञ्चकम् । विसन्तति farartificer कृत्कर्म देहिनाम् ॥२२६॥ आठवाँ कर्म अन्तराय है सो विघ्न करने वाला है । यह अपनी सामर्थ्यं (उदय) से जीवों के प्राप्त होने वाले शक्ति दान लाभ भोग उपभोग में विघ्न सन्तति की रचना करता है । यति दान योगादिक में अन्तराम डाल कर उनको रोकता है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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