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________________ २१४ ] दृष्टिमोह प्रकोपेन दृष्टि साध्वी विलुप्यते । लिपनिमज्जन्ति प्राणिनः श्वासागरे ॥ २१७ [ गो. प्र. चिन्तामणि तत्पश्चात् चौथा मोहनीय कर्म है। उसके दो मूलभेद हैं एक दर्शन मोहनीय और दूसरा चारित्र मोहनीय इनमें से दर्शन मोहनीय नामक कर्म प्रकोप (उदय) से जीवों का सम्यक्दर्शन लोपा जाता है, सम्यक् दर्शन के लोप से जीव नरक रूपी समुद्र में डूबता है, इस दर्शन मोहनीय की मिथ्यात्व सम्यक मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति मिथ्याल ऐसी तीन प्रकृतियाँ हैं । चरित्र मोह पाकेन नाङ्गिभिर्लभ्यते क्षणम् । भाव शुद्धया स्वसात्तु चरणं स्वान्त शुद्धिदम् ॥२१८॥ दूसरा चारित्र मोह कर्म है, उसके उदय से यह प्राणी मन की शुद्धि देने वाले चारित्र को भात्र की शुद्धता से अंगीकार करने के लिए क्षणमात्र भी समर्थ नहीं होता । avart यत्प्रमान्ति यत्स्खलनत्थ संयमात् । 'सोऽपि चरित्र मोहस्य विपाकः परिकीर्तितः ॥२२६॥ जो संयम (चरित्र) को ग्रहण करके भी जीव प्रभाव रूप होता है । और संयम से भ्रष्ट हो जाता है। उसका कारण भी चरित्र मोह का उदय कहा है । भावार्थ - पहिले श्लोक में तो चरित्र मोह के उदय से संयम को ग्रहण ही न कर सके, ऐसा कहा है और यहां ऐसा कहा है कि कदाचित चरित्र मोह के क्षयोपशय से चरित्र ( संयम ) ग्रहण कर ले तो उसमें भी प्रमाद होता है । यथवा तीव्र उदय होता है तो संयम से भ्रष्ट भी हो जाता है । इस चरित्र मोह की प्रकृति जो क्रोध मात माया लोभादिक २५ कषायें हैं, उनको वर्णन अन्य ग्रन्थों से जानना । प्रश्न : --- श्रायु कर्म का विपाक किस प्रकार है ? उत्तर :- सुरायुरारम्भ ककर्मपाकात्संभूय नाके प्रथितभावः । समथ्यैते देहिभिरायुरश्यं सुखा मृतस्वाद लोलचित्तः ॥ २२० ॥ पांचवां प्रयुकर्म हैं, उसके ४ भेद हैं- देवायु मनुष्यायुं तियंगायु और नरका सों इनमें से देवायु उत्पन्न करने वाले कर्म के उदय से प्राणी स्वर्ग में . उत्पन्न होकर विख्यात है प्रभाव जिसका और सुखामृत के प्रास्वादन में प्रासक्त है। चित जिसका ऐसा देव हो स्वर्ग के सुख भोगता है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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