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अध्याय : पांचवां ]
[ २१३ मूल प्रकृतयस्तत्र कर्मणामष्ट कीर्तिताः । ज्ञातावरगा पर्वास्ता जन्मिना बन्ध हेतवः ।।२११।।
कर्म की मूल प्रकृति (भेद) आठ हैं, ज्ञानाबरणादिक, बे जीवों के बंधन का कारा हैं। . . . .
ज्ञाना पतिकरं कर्म पञ्च भेद प्रपञ्चितम् । निरुद्ध येन जीवानां मतिज्ञानादि पञ्चकम् ॥२१२॥
उन आठ कर्म प्रकृत्तियों में से प्रथम ज्ञान को पावरमा करने वाला नानावरणीय कर्म पांच भेद रूप कहा गया है, इन पांचों ज्ञानावरण कर्मों ने जीवों के मति ज्ञानादिक (मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल) पांचों ज्ञानों को रोक रक्या है अर्थात् ढक रक्खा है।
'नवभेदं मतं कर्म शावरण संज्ञकम् । रुद्धयते येन जन्तूनां शश्वदिष्टार्थ दर्शनम् ॥२१३॥
दूसरा दर्शनावरण नामक कर्म वह नव प्रकार का है, जिसने जीवों के निरन्तर इष्ट वस्तु के दर्शन को रोक. रक्खा है, अर्थात् ढक रक्खा है ।
वेवनीयं विदुः प्राज्ञा द्विधा कर्म शरीरिणाम् । यन्मधूधिष्टछक्त शस्त्र धारा समप्रभम् ॥२१४॥
इसके पश्चात् तीसरा वेदनीय कर्म दो प्रकार का है, एक साता वेदनीय और दूसरा असाता वेदनीयः सो यह कर्म जीवों को शाहद-लिपटी तलवार की धार के समान किचित् सुखदायक है।
सुरोगनराधीश सेविसं श्रयते सुखम् । सालोदयवशात्प्राणी संकल्पानन्तरोद्भवम् ॥२१॥ असद घोदयातीत शारीरं मानसं द्विधा । जीवो विसह्यते दुःखं शश्वच्छ्यभ्रादि भूभिषु ।।२१६॥
यह प्रारगी साता वेदनीय के उदय के वश से तो देवेन्द्र, नागेन्द्र, धरणीन्द्र ब चक्रवतियों से सेवित तथा मन के संकल्प करते ही प्राप्त होने वाले सुख को प्राप्त होता है । और असाता देदनीय के उदय से शरीर संबन्धी और मन संबन्धी . . . .. दो प्रकार के तीब्र दुःख नरकादिक पृश्वियों में भोगता है ।