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[ गो. प्र. चिन्तामणि सर्व ऋतुओं में मुख देने वाले रमगहीय और काम भोग के स्थान ऐसे क्षेत्रों - को प्राप्त होकर अतिशय सुख का अनुभव करते हैं।
प्रासा सिदनुर यन्त्र पन्न गगर व्यालानलोग्रग्रहान् । ....... शील हनि कोटक फरज क्षारा स्थिपङ्कोपलान् ॥
कारागृङ्खल शङ्ककाण्ड निगड न रारि वैरास्तथा । द्रव्याण्याप्य भजन्ति दुःख मखिलं जीवा. भवाहवस्थिताः ॥२०६॥
संसार रूप मार्ग में रहते हुए जीव माला तलबार छुरा यन्त्र, बन्दूक आदि शस्त्र और सर्पविष दुष्ट हस्ती अग्नि तीन खोटे ग्रहादिक को तथा दुर्गन्धित सड़े हुए अंग, लट, रज, क्षार, वरी, वैर इत्यादि द्रव्यों को प्राप्त होकर दुःखों को भोगले हैं । ... निसगरगातिरौद्रारिस भयल्केशास्पदानि च।
दुःख मेवाप्नुवन्त्युच्चैः क्षेत्राण्या. साद्य जन्तवः ॥२०७।।
ये प्राणी स्वभाव से ही रौद्र' भय और क्लेश के ठिकाने ऐसे क्षत्रों न को प्राप्त होकर अतिशय दुखों को ही पाते हैं ।
अरिष्टोत्पात निर्मुक्तो. वात वर्षा विजितः । शीतोष्ण रहित : काल : स्यात्सुखाय शरीरिणाम् ॥२०॥
अरिष्ट (दुःख देने वाले) उत्पात. से रहित तथा पवन वर्षा आदि से वर्जित और अति उष्णता रहित काल जीवों के सुख के लिए है।
वर्षात पतुषाराढ्य ईत्युत्पातादि संकुलः । काल सदैव सखाना दुःखानल निबन्धनम् ॥२०६॥
वर्षा आतप, हिम (बर्फ) सहित तथा . ईति कहिये स्वचक्र परचक्रादिकों के उत्पात प्रादि सहित काल जीवों को निरन्तर दुःख रूप अग्नि का कारण है। . . . . . . . . . . . .
प्रश्न :-जीव को किस भाव से सुख अथवा दुःख होता है। उत्तर :- प्रशमादि समुदत्तो भावः सौख्याय देहिनाम् ।
... कर्म गौर वजः सोऽयं महाध्यसन मन्दिरम् ॥२१॥ · जो कर्म के उपशमादिक से उत्पन्न हुा भाव है । वह तो जीवों को मुख के अर्थ है और जो कर्म के तीव्र गुरुपना से उत्पन्न हुआ भाव है सो महान् १ का घर है। . . . .
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