SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 263
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय : पांचवां ] [ २११ अविरत मनुपूर्व ध्यायतोऽस्त प्रमाद, स्फुरति हृदि विशुद्ध ज्ञान भास्वत्प्रकाशः ।।२०१॥ यह पूक्ति प्रकार का अपाय विचय नामा ध्यान सैकड़ों नयों को अवलम्बन .. करने वाला है, तथा दूर किये हैं, समस्त दोष जिसने ऐसे समस्त कलंक रहित सर्वज्ञ देव ने कहा है, सो जो कोई पुरुष इसको अनुक्रम से निरन्तर प्रमाद रहित होकर ध्याता है, उसके हृदय में निर्मल ज्ञान रूप सूर्य का प्रकाश स्फुरायमान होता है। विपाक विचय धर्मध्यान--- स विपाक इति ज्ञेयो य स्वकर्म फलोदयः । प्रतिक्षण समुद्भूत चित्ररूपः शरीरिणाम् ।।२०२।। प्राणियों के अपने उपार्जन किये हए कर्म के फल का जो उदय होता है, यह विपाक नाम से कहा है। सो बह कर्मोदय क्षरण प्रतिक्षण उदय होता है और ज्ञानावरणादि अनेक रूप है। कर्मजातं फलं दत्ते विचित्रमिह देहिनाम् । प्रासाद्य नियतं नाम द्रव्यादिक. चतुष्टयम् ।।२०३॥ जीवों के कर्मों का समूह निश्चित द्रव्य क्षेत्र काल भाव रूप चतुष्टय को पाकर इस लोक में अनेक प्रकार से अपने नामानुसार फल (भागे कहते हैं उस प्रकार) को देता है। स्त्रक् शय्या सनया वस्त्र वनिता वादिन मित्राइनान्, करा गुरु चन्द्र चन्दन वनक्रीड़ाद्रि सौधध्वजान् । मातङ्गांच्च विहङ्ग चामर पुरीभक्षान्नपानानि वा, छत्रा दीनु पलभ्य वस्तु विनयान्सौख्यं श्रयन्तेऽङ्गिन्तः ॥२०४॥ ये प्राणी पुष्पमाला, सुन्दर शय्या, आसन, यान, वस्त्र, स्त्री, बाजे, मित्र, पुत्रादि को तथा कपूर अगुरु चन्द्रमा चन्दन वनक्रीड़ा पर्वत महल हवनादिक को तथा हस्ती घोडे, पक्षी चामर नगरी और खाने योग्य अन्नपानादिक को तथा छत्रादिक वस्तुसमूह । को पाकर मुख का आश्रय करते हैं अर्थात् भोगते हैं । क्षेत्रारिण : रमणीयानि सर्व सुख दायिनि च । काम भोगास्पदान्युच्चैः प्राप्त सौख्यं निषेव्यते ।।२०५॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy