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[ गो. प्र. चिन्तामणि एको भावः सर्वभाव स्वभावः सर्वे भावा एक भाव स्वभावाः .. .. . . एको भावस्तत्वतो येन बुद्धः सर्वे भावास्तत्वतस्तेन बुद्धाः ॥१६७।। .. . एक भाव सर्व भावों के स्वभाव स्वरूप है और सर्व भाव के स्वभाव स्वरूप
हैं, इस कारण जिसने तत्व (यथार्थपने) से एक भाव को जाना, उसने समस्त भावों को यथार्थतया जाना ।
भावार्थः । आत्मा का एक भब रंगा है कि जिसमें समस्त भाव (पदार्थ) प्रतिविम्बित होते हैं, उन पदार्थों के आकार स्वरूप भाव होता है, तथा वे भाव सब ज्ञेय हैं, उनके जितने प्राकार है, वे एक ज्ञान के आकार होते हैं । इस कारग जो इस प्रकार के ज्ञान के स्वरूप को यथार्थ जानता है, उसने सब ही पदार्थ जाने
अर्थात् ज्ञान ज्ञेयाकार हुया इस कारण ज्ञान को जाना तब सब ही जाना, क्योंकि ज्ञान . . . ही आत्मा है, इस कारण ऐसा कहा है। .....
यावद्यावच्च सम्बन्धो मम स्याब्दावस्तुभिः । तावत्ताबस्वयं स्वस्मिस्मिस्थितिः स्वप्नेऽपि दुर्घटा ॥१९८।।
फिर ऐसा ध्यान करे कि जब-जब मेरे वस्तुओं से सम्बन्ध होते हैं, तब-तब मेरी पाप से ही अपने में ही स्थिति होना स्वप्न में भी दुर्घट है ।
तथैवैतेऽनुभूयन्ते पदार्थाः सूत्र सूचिताः । अतो मार्गेऽत्र लग्नोऽहं प्राप्त एव शिवास्पदम् ॥१६॥
फिर ऐसा विचारे कि जिनसूत्र में जो पदार्थ कहे हैं, वे वैसे ही अनुभव किये जाते हैं और जैसे कहे हैं वैसे ही दिखते हैं। इस कारण इस सूत्र के मार्ग में लगा हूं । इसी कारण मोक्ष स्थान भी पाया हुआ है ऐसा मानता हूँ, क्योंकि जब मार्ग पाया और उस मार्ग में चला तो असली ठिकाना प्राप्त हुआ ही कहा जाता है !
इत्युपायो विनिश्चयो मार्गाच्यवन लक्षणः । . कर्मणां च तथापाय उपायश्चात्म सिद्धये ।।२०।।
इस प्रकार पूर्वोक्त मोक्ष मार्ग से नहीं छूटना है, लक्षण जिसका ऐसा तो उपाय निश्चय करना तथा वैसे ही कमों का अपाय (नाश) निश्चय करना इस प्रकार अपाय और उपाय दोनों का आत्मा की सिद्धि के लिये निश्चय करना चाहिये। , ... इति नय ज्ञात सीमालम्बि निदत दोष,
च्युत सकल कलङ्क कोतितं ध्यान मेतत् ।