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________________ अध्याय : पांचवां । [ २०६ . फिर ऐसा चिन्तन करे किं प्रसिद्ध हैं स्वरूप जिसका ऐसा मैं सिद्ध हूँ दर्शन ज्ञान ही निर्मल नेत्र हैं, जिसके ऐसा हूं तथापि संसार रूपी कीचड़ में अपने उपार्जन किये हुए कर्मों से खण्ड-खण्ड किया चिरकाल से खेद खिन्न हुआ हूँ। . एकतः कर्मणां सैन्यमहमेकस्ततोऽन्यत । स्थातव्यमप्रमत्तेन मयास्मिन्नरि संकटे ॥१६३।। इस संसार में एक ओर तो कर्मों की सेना है और एक तरफ में अकेला हूँ इस कारण इस शत्रुसमूह में मुझको अप्रमत (सावधान) होकर रहना चाहिये। असाववान रहूंगा तो कर्मरूप बैरी हैं, इसलिए वे मुझे बिगाड़ देंगे। किमुपेयो ममात्मायं किंवा विज्ञान दर्शने । चरखं वापवर्गाय गिमिः साद्ध स एन वा ।।१६४॥ फिर ऐसा विचार करें मोक्ष के लिये मेरा यह प्रात्मा उपादेय है, अथवा ज्ञान दर्शन उपादेय है, अथवा चारित्र उपादेय है, अथवा ज्ञान दर्शन चारित्र इन तीनों सहित प्रात्मा ही उपादेय है। कोऽहं ममास्त्रवः कस्मात्कथं बन्धः का निर्जरा। का मुक्तिः कि. विमुक्तस्य स्वरूपं च निगद्यते ॥१६॥ फिर ऐसा विचार कि मैं कौन हूं और मेरे कर्मों का पास्त्र क्यों होता हैं ? तथा कर्मों का बंध क्यों होता है और किस कारण से निर्जरा होती है और मुक्ति क्या वस्तु है ? एवं मुक्त होने पर आत्मा का क्या स्वरूप कहा जाता है । जन्मनः प्रतिपक्षस्य मोक्षस्यात्यन्तिकं सुखम् । अव्या बाधं स्यभावोत्थं केनोपायेन लस्यते ॥१६६॥ फिर ऐसा विचारे किं संसार का प्रतिपक्षी जो मोक्ष हैं, उसका अविनाशी अनन्त अव्याबाध (बाचा रहित) स्वभाव से ही उत्पन्न हुमा (स्वाधीन) सुख किस उपाय से प्राप्त हो । . मय्येव विदिते साक्षाद्विज्ञातं भुवनत्रयम् । यतोऽहमेव सर्वज्ञः सर्वदर्शी निरञ्जनः ।।१३।। फिर ऐसा ध्यान करे कि मेरे स्वरूप को जानने से मैंने तीनों भुवन जान लिये, क्योंकि मैं ही सर्वज सबका देखने वाला निरंजन और समस्त कर्म कालिमा से .. रहित हूं। . . सात सुवननयम।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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