________________
।
२०८ ]
| गो. प्र. चिन्तामणि श्री मत्सर्वज्ञ निविष्ट मार्ग रत्नत्रयात्मकम् । अनासाद्य भवास्ये चिरं नष्टाः शरीरिणः ।।१८७।। मज्जनोन्मज्जनं शश्वद्भजन्ति भव सागरे ।
वराकाः प्राणिनोऽप्राप्य यानपात्रं जिनेश्वरम् ॥३॥१८॥ इस ध्यान में ऐसा चिन्तन होता है कि ये प्रारणी श्रीमत्सर्वज्ञ जिनेन्द्र के उपदेश किये हुए सम्यग्दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र रूप मार्ग न पाकर संसार रूप वन में बहुत काल पर्यन्त नष्ट होते हुए जन्म मरण और उपार्जन किये कमों के नाश करने का उपाय जो रत्नत्रय सो उन्होंने नहीं पाया । तथा ये रंग प्राणी जिनेश्वर देवरूपी जहाज को न पाकर संसार रूप समुद्र में निरन्तर मज्जन उन्मज्जन करते हैं, अर्थात निरन्तर जन्म-मरण पाते रहते हैं। और दुःख भोगते हैं, इस प्रकार चिन्तवन करें 1
महाव्यसन सप्ताचिः प्रदीप्ते जन्म कानने । भ्रमताऽद्य मया प्राप्तं सम्यग्ज्ञानाम्बुधेस्तटम् ।।१८६।।
फिर ऐसा चिंतन करें कि महान कष्ट रूपी अग्नि से प्रज्वलित इस संसार रूपी वन में भ्रमण करता हुआ में इस समय सम्यरज्ञान रूपी समुद्र तट (किनारा.) पा गया।
प्रद्यपि यदि निर्वेद विवेकागेन्द्र मस्तकात् । स्खलेत्तदेव जन्मान्ध फूपपातोऽनिवारितः ॥१६॥
फिर इस प्रकार चिन्तन करें कि मैंने इस समय सम्यग्ज्ञान पाया है, सो यदि अब भी बैराग्य और भेद ज्ञान रूप पर्वत के शिखर से गिरू तो संसार रूप अंधपः । ___ में अवश्य गिर पड़ना होगा ।।५॥ .
अनादिनम संयूतं कथं निर्वायते मया।
मिथ्यात्वा विरति प्रायं कर्मबन्ध निबन्धनम् ॥१६॥ . . तत्पश्चात् इस प्रकार चिन्तन करे कि अनादि अविद्या से उत्पन्न हुए तथा जिसमें मिथ्यात्व व अविरत की बहुलता है, ऐसे कर्मबंध होने के कारण मुझ से किस प्रकार निवारण किये जायेंगे।
सोऽहं सिद्धः प्रसिात्मा छरबोध विमलेक्षणः । जन्म पक्के चिर खिम्नः खण्डयमानः स्वकर्मभा ॥१६२।।.
RESS
....
.
.