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अध्याय: पांचवां ]
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मम में गमन करने के लिए दिव्य ग्रानक कहिये पटह नाम का वाजा है, तत्वाभान ( मिथ्यात्व ) रूपी हिरण के नाश करने को सिंह के समान है तथा भव्य जीवों को मोक्ष मार्ग में चलाने के लिये समर्थ है। ऐसे इस सिद्धान्त रूपी समुद्र के जल की हे गुणी जनों । कर्म रूपी अञ्जलियों से पात करो ||२०||
येनेते निपतन्ति वादि गिरयस्तु व्यन्ति योगीश्वराः । भव्या येन विदन्ति निर्वृति पदं मुञ्चन्ति मोहं बुधाः ॥ धुर्यमिनां यदक्ष सुखस्या धार भूतं नृणां । तल्लोकद्वय शुद्धिदं जिनवचः पुष्याद्विवेक श्रियम् ॥ १८४ ॥
जिसके द्वारा प्रसिद्ध बादीरूप पर्वत गिरते हैं, अर्थात् खंड-खंड हो जाते हैं, तथा जिसके द्वारा योगीश्वर प्रसन्न होते हैं जिसके द्वारा भव्य जीव मोक्षपद को जाते हैं, अर्थात् प्राप्त होते हैं, तथा जिसको पढ़कर पंडित जन संसार के मोह को छोड़ देते हैं, तथा जो वचन संयमी मुनियों का बंधु (हित करने वाला है) तथा जो ..पुरुषों का अविनाशी सुख का प्राधारभूत है, इस प्रकार दोनों लोकों की शुद्धता का देने वाला जिनेन्द्र भगवान का वचन भव्य जीवों की विवेक रूपी श्री को पुष्ट करें। इस प्रकार यह आशीर्वाद है ।
सर्वज्ञाज्ञां पुरस्कृत्य सम्यगर्थात् विचिन्तयेत् ।
यत्र तद्धयानमाम्नात माज्ञाख्यं योगि पुङ्गवैः ॥१८५॥
जिस ध्यान में सर्वज्ञ की याज्ञा को अग्रेसर (प्रधान) करके पदार्थों को सम्यक्प्रकारसित करें (विचारे) सो मुनियों ने आज्ञा विचयं नाम धर्म ध्यान कहा है।
अपवित्रय धर्मध्यान का स्वरूप ----
अपाय विचयं ध्यानं तद्वदन्ति मनीषिरगः ।
प्रायः कर्मणां यत्र सोपायः स्मर्यते बुधैः ॥ १८६॥
जिस ध्यान में कर्मों का अपाय ( नाश ) हो तथा सोपाय कहिये पंडितजना करके इस प्रकार जिसमें चिन्तवन किया जाय कि इन कर्मों का नांश किस उपाय से होगा ? उस ध्यान को बुद्धिमान् पुरुषों ने अपाय विन्वय कहा है । अपायविचय धर्मध्यान में योगी यह विचार करें कि