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BHASKAR
Prakasminess
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[ गो. प्र. चिन्तामणि सादि अनादि व्यवस्था रूप है, द्रव्यनय से संतान की अपेक्षा अनादि है और पर्यायनय की अपेक्षा तीर्थंकरों की दिव्य ध्वनि प्रकट होता है, इस कारण सादि है।
निः शेषनय निक्षेप निकषनाच सन्निभम् । स्याद्वाद' पविनिर्घात भग्नान्यभत भूधरम् ।।१०।।
फिर यह श्रुतज्ञान समस्त नय निक्षेपों से वस्तु के स्वरूप की परीक्षा करने के लिये कसोटो के समान है । स्थावाद का हवे कथंचित् वचनरूपी बज के निीत से भग्न किये हैं, अन्यमत रूपी पर्वत जिसने ।
इत्यादि गुरग संदर्भ निर्भरं भव्य शुद्धिदम् । ध्यायन्तु धीमतां श्रष्ठाः श्रु तज्ञान महार्णवम् ॥१८१॥
इत्यादि पूर्वोक्त गुणों की रचना से भरा हुआ भव्य जीवों की शुद्धि को देने । वाला श्रुतज्ञान रूप महासमुद्र है, सो इसको वुद्धिमानों से जो श्रेष्ठ हैं, वे व्याया। (चितवन करो) यह प्रेरणाारूप उपदेश है। श्रतज्ञान की महिमा
यज्जन्मज्वर घातकं त्रियुवनाधीशैर्यदम्यचित्तं । । यत्स्याद्वाद महाध्वज नय शता कीर्णम् यत्पठयते ।।। उत्पाद स्थिति भङ्गलाच्छन युता यस्मिनपदार्थाः स्थिता ।। स्तच्छीवीरमुखार बिन्दादितं दद्यातं व शिवम् ।।१५२॥ .
जो श्रुतज्ञान संसार रूपी ज्वर का तो घातक है और तीन भुवन के 'ईश इन्दों से यूजित है। लथा जो स्याद्वाद रूपी बड़ी ध्वजा वाला है और सैकड़ों नयों से पूर्ण है, ऐसा कहा जाता है तथा जिसमें उत्पाद व्यय प्रौव्या लांछन युक्त पदार्थ । रहते हैं, ऐसे श्री वर्द्धमान स्वामी के मुख कमल से कहा हुया श्रुत ज्ञान तुम श्रोताः । जनों को कल्याण रूप हो ऐसा पाशीर्वचन है।
वाग्देव्याः कुल मन्दिरं बुधननानन्दैक चन्द्रोदयं । मुक्ते मङ्गिाल मग्निम शिव पथ प्रस्थान दित्यानकम् ॥ तत्वाभासकरङ्गपञ्च वदनं भव्यान्विनेतु क्षमं । तन्छोत्रालिमिः पिनन्तु गुरिगनः सिद्धान्त वा पयः ॥१८३।।
जो वाग्देवी (सरस्वती के रहने का कुलगृह है, तथा विद्वानों के ग्रानन्द उपजाने के लिये अद्वितीय चन्द्रमा का उदय है । मुक्ति का मुख्य मंगल व