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अध्याय : पांचवां ।
[२०५ नयोपनय संताप गहनं गणिभिः स्तुतम् । . विचित्र मपि चित्रार्थ संकीर्ण विश्व लोभनम् ॥१७५।।
फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? द्रव्याथिक पर्यायाथिक नय और सद्भूत असद्भूत अवहारादिक उपनयों के संपात से तो गहन है तथा गाधरादिकों करके स्तुति करने योग्य है तथा विचित्र कहिये अपूर्व है, तयापि चित्र कहिये अनेक प्रकार के अर्थों से भरा हुमा है. तथा समस्त लोक को दिखाने के लिये नेत्र के समान है। .
अनेक पद विन्यासरङ्गापुः प्रकीर्णकः । .. .. प्रसृतं. यन्दि भास्युच्च रत्नाकर इवापरः ।।१७६॥
फिर कैसा है ? श्रुतज्ञान अनेक पदों का विन्यास (स्थान) है, जिनमें ऐसे प्राचारादि अंग तथा अग्रायणी आदि पूर्व और सामायिकादि प्रकीर्णकों से विस्तार रूप है, सो वह श्रुतज्ञान जिस प्रकार रत्नाकर (समुद्र) शोभता है, उसी प्रकार शोभता है ।
मदमतोद्वतक्षुद्र शासनाशीविषान्तकम् । दुरन्तधन मिथ्यात्व ध्यान्त धर्मालम् ।।१७।।.
फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? मदसे माने उद्धृत क्षुद्र (नीच) सर्वथा एकान्त वादियों का शासन (मत) रूपी अशी विष कहिये सर्प का अन्तक है, अर्थात् नष्ट करने वाला है तथा दुरन्त कहिये जिसका अन्त बहुत दूर है. ऐसे दृढ़ मिथ्यात्वरूपी अन्धकार के दूर करने को सूर्य मण्डल के समान है।
यत्पवित्र जगत्यस्मिन्विशुद्धयति जगत्रयी। येन तद्धि सत्तां सेव्यं श्रु तज्ञानं चतुविधम् ॥१७॥
फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? इस जगत में पवित्र हैं, क्योंकि जिसके द्वारा ये तीनों जगत् पवित्र होते हैं, इसी कारग ही वह श्रुतज्ञान सत्पुरुषों के सेवने योग्य है । यह श्रुतज्ञान प्रथमानुयोग, करुणानुयोग, चरमानुयोग और द्रव्यानुयोग के भेद से चार प्रकार का है।
स्थित्युत्पति व्ययोपेतं तृतीयं योगि लोचनम् । नयद्वय समावेशासाद्यनाबि व्यवस्थितम् ॥१७॥
फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? उत्पाद, व्यय, धौव्य करके संयुक्त है तथा योगीश्वरों का तीसरा नेत्र है तथा द्रव्याथिक और पर्यायाथिक इन दो नयों के कारण
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