SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 256
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २०४ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण वीतराग हैं, वे अन्यथा वादी नहीं होते यदि सर्वश न हो तो बिना जाने अन्यथा कहें. अथवा वीतराग न हो तो रागद्वेष के कारण अन्यथा कहें और सर्वज्ञ और वीतराग हो. वह कदापि अन्यथा नहीं कहेगा ! प्रमाणनय निक्षेपे निति तत्व परजसा । स्थित्युत्पतिच्ययोपेतं चिद चिल्लक्षणं स्मरेत् ॥ १७१ ॥ hat faar ध्यान में प्रमाण नय निक्षेपों से निर्णय किये हुए स्थिति, उत्पति और व्यय संयुक्त अर्थात् उपजें विन स्थिर रहे ऐसा और चेतन अचेतन रूप है लक्षण जिसका, ऐसे तत्त्व समूह का चिन्तवन करें । श्रीमत्सर्वज्ञ देवोत श्रुतज्ञानं च निर्मलम् । शब्दार्थ निचितं चित्र मंत्र चिन्त्यम विप्लुत्तम् ।।१७२ ॥ तथा इस ग्राज्ञा विचय ध्यान में श्रीमत्सर्वज्ञ करके कहे हुए निर्मल और शब्द तथा अर्थ में परिपूर्ण नाना प्रकार के निर्बाध श्रुतज्ञान का चिन्तन करना चहिये । श्रुतज्ञान का वर्णन ----- परिस्फुरति यत्रंत विश्वविद्या कदम्बकम् । द्रव्यभावभिदा तद्धि शब्दार्थज्योतिर ग्रिमम् ॥ १७३ ॥ शब्द और अर्थ का प्रकाश है मुख्य जिसमें ऐसा तथा जो समस्त प्रकार की विद्या का समूह है । अर्थात् याचार श्रादि अंग पूर्व अंग बाह्य प्रकीक रूप विद्या का समूह है। तथा द्रव्य श्रुत ( शब्द रूप ) और भावश्रुत ( ज्ञानरूप ) में दो हैं भेद जिसके ऐसा सर्वज्ञ भगवान का कहा हुद्या श्रुतज्ञान है । अपार मति गम्भीरं पुण्यतीर्थं पुरातनम् । gate विरोधादिकलङ्क परिवजितम् ॥ १७४॥ फिर कैसा है श्रुतज्ञान प्रपार है, क्योंकि जिसके शब्दों का पार कोई अल्पज्ञानी नहीं पा सकता । तथा गंभीर है क्योंकि जिसके अर्थ की श्राह हर कोई नहीं पा सकता : तथा पुण्य तीर्थ है । क्योंकि जिसमें पाप का लेश नहीं है अर्थात् निर्दोष हैं इसी कारण जीवों को मारने वाला है तथा पुरातन है अर्थात् अनादि काल से चला आया है और पूर्वापर विरोध आदि कलकों से रहित है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy