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अध्याय : पांचवा ] हैं, और परमात्मा जो अहात सिद्ध परमेष्ठी हैं, वे छद्मस्थ करके (अल्पज्ञानी के). दष्ट नहीं हैं, तथा उनके समान अपना स्वरूप निश्चय नय से कहा है, वह भी शक्ति रूप है, सो वह भी छगस्थ के ज्ञान का उपयोग दृष्ट है सो इसी के संबंध से सर्वज्ञ के आगम से परमात्मा का स्वरूप निश्चय कर श्रुतज्ञान. के भेद रूप शुद्ध नय के द्वारा परमात्मा का ध्यान करना चाहिये इसी से परमात्म पद की प्राप्ति होती है ।
प्रश्न :-धर्म ध्यान के कितने भेद है ? . .. .. . उत्तर:-..-प्राज्ञापाय विपाकानां क्रमशः संस्थितेस्तथा ।
विचयो यः पृथक् तद्धि धर्म ध्यानं चतुविधम् ।।१६७॥
. माज्ञा, अपाय, वि तथा हो यान इनका भिन्न-भिन्न विषय (विचार) अनुक्रम से करना हो धर्म ध्यान के चार प्रकार हैं। यहाँ विचय नाम विचार करने अर्थात् चितबन करने का है, तथा इन चारों के नाम इस प्रकार कहने चाहिये--१. पाना बिचय, २. अपाय विचय; ३. विपाक विचय और ४. संस्थान विचय ।
प्रश्न :--- प्राज्ञाविचय धर्म ध्यान का स्वरूप क्या है ? उत्तर :--बस्तु तत्त्वं स्वसिद्वान्तं प्रसिद्ध यन्न चिन्तयेत् ।
सर्वज्ञा. भियोगेन तदाज्ञा विचयो मतः ॥१६॥
जिस धर्म ध्यान में अपने जैन सिद्धान्त में प्रसिद्ध वस्तु स्वरूप को सर्वज्ञ भगवन् की आज्ञा की प्रधानता से चितवन करें, सो प्राज्ञा विचय नामा धर्म ध्यान का प्रथम भेद है।
अनन्त गुग पर्याय संयुतं तत्त्रयारयारभकम् । त्रिकाल विषमं साक्षाजिनाज्ञा सिद्ध मामननेत् ॥१६॥
अाज्ञा विनय धर्म ध्यान में तत्त्व अनन्त गुण पर्यायों सहित यात्मक त्रिकाल गोचर साक्षात् जिनेन्द्र भगवान् की आज्ञा से सिद्ध हुआ चितवन करें। - सूक्ष्म जिनेन्द्र वचनं हेतु भियन्न हन्यते ।
प्राज्ञा सिद्ध च तद् ग्राह्य नान्यया वादिनो जिनाः ॥१७॥
जिनेन्द्र सर्वज्ञ देव के वचनों से कहे हुए सूक्ष्म तत्त्व हेतु से वाध्य नहीं हैं, ऐसे तत्त्व प्राज्ञा से ही ग्रहण करने (मानने) चाहियः क्योंकि जिनेन्द्र भगवान् .