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________________ अध्याय : सातवां ] [ ५१७ महापुरुष, महोरगों के प्रतिकाय और महाकाय, गन्धर्वो के गीतरति और गीतयश, यक्षों के पूर्णभद्र और मणिभद्र, राक्षसों के भीम और महाभीम, भूतों के प्रतिरूप और अप्रतिरूप और पिशाचों के काल और महाकाल माम के इन्द्र होते हैं । देवों के भोगों का वर्णन-~ काय प्रवीचारा पा ऐशानात् ॥१२०४॥ ऐशान स्वर्गपर्यन्त के देव अर्थात् भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और प्रथम व द्वितीय स्वर्ग के देव, मनुष्य और तिर्यञ्चों के समान शरीर से काम सेवन करते हैं । मर्यादा और अभिविधि, क्रिया योग और ईषत् अर्थ में 'माइ' उपसर्ग याता है । तथा वाक्य और स्मरमा अर्थ में 'आ' उपसर्ग प्राता है । 'पा' उपसर्गः को स्वर परे रहते सन्धि नहीं होती। इस सूत्र में श्री और ए ( ऐ) इन दोनों की सन्धि हो सकती थी, लेकिन सन्देह को दूर करने के लिये प्राचार्य ने सन्धि नहीं की है। यहाँ प्रा अभिविधि के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अभिविधि में उस वस्तु का भी अहरण होता है, जिसका निर्देश मा के बाद किया जाता है जैसे इस सूत्र में ऐशान स्वर्ग का भी ग्रहण शेषाः स्पर्श रूप शब्य मनः प्रचोछाराः ॥१२०५॥ - शेष देव (तृतीय स्वर्ग से सोलहवें स्वर्ग तक) देवियों के स्पर्श से, रूप देखने से, शब्द सुनने से और भन में स्मरण मात्र से काम सुख का अनुभव करते हैं। सनत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग के देव और देवियां परस्पर में स्पर्श मात्र से; ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव और कापिष्ठ स्वर्ग के देव और देवियां एक दूसरे के रूप को देखने से; शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्त्रार स्वर्ग के देव और देवियां परस्पर शब्द श्रवण से और पानत, प्रारपत, पारद और अच्युत स्वर्ग के देव पौर देवियां मन में एक दूसरे के स्मरण मात्र से अधिक सुख का अनुभव करती हैं। परेऽप्रवीचारा: ॥१२०६॥ तब प्रेयेयक, नथ अनुदिश और पञ्चोत्तर विमानवासी देव फामसेवन से रहित होते हैं । इन देशों को कामसेवन की इच्छा ही नहीं होती है। उनके तो सदा हर्ष और प्रानन्द रूप सुख का अनुभव रहता है । भवनवासियों के भेद भवनवासिनोऽसुर नागवियत्सुपग्निवातस्तमितोधि द्वीप दिक्कुमाराः ॥१२०७॥ n tiindian Nare -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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