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[ गो. प्र. चिन्तामरिग
श्रास्त्र -- मंत्री और पुरोहित के काम को करने वाले देव त्रास्त्रिश कहलाते हैं । ये संख्या में तैंतीस होते हैं ।
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पारिषद -- सभा में बैठने के अधिकारी देवों को पारिषद कहते हैं । श्रात्मरक्ष—इन्द्र की रक्षा करने वाले देव प्रात्मरक्ष कहलाते हैं । लोकपाल - जो देव अन्य देवों का पालन करते हैं, उन्हें लोकपाल कहते हैं । ये आरक्षिक, वर और कोट्टपाल के समान होते हैं। जो ग्राम आदि की रक्षा के लिये नियुक्त होते हैं, उनको आरक्षक कहते हैं । अर्थ (घन ) सम्बन्धी कार्य में नियुक्त श्रर्थचर कहलाते हैं । पतन, नगर आदि की रक्षा के लिये नियुक्त (कोट्टपाल ) कहलाते हैं । अनीक -- जो हस्ति, अश्व, रथ, पदाति, वृषभ, गन्धर्व और नर्तकी इन सात प्रकार की सेना में रहते हैं, ये अनीक हैं ।
नगरवासियों के समान जो इधर-उधर फैले हुये हों, उनको
ate कहते हैं ।
श्रभियोग — जो नौकर का काम करते हैं, वे अभियोग्य हैं ।
fafeature -- किल्विष पाप को कहते हैं । जो सवारी में नियुक्त हों तथा नाई आदि की तरह कर्म करने वाले होते हैं, उनको किल्विषिक कहते हैं । Raftar लोकपालवर्ज्या व्यन्तर ज्योतिष्काः ॥५॥
व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में त्रास्त्रिश और लोकपाल नहीं होते हैं । reat की व्यवस्था के प्रकार-
पूर्वयोन्द्राः । १२०३॥१
भवनवासी और व्यन्तर देवों में प्रत्येक भेद सम्बन्धी दो-दो इन्द्र होते हैं । Tatari देवों में असुर कुमारों के अमर और वैरोचन, नागकुमारों के ster और भूतानन्द, विद्युत्कुमारों के हरिसिंह और हरिकान्त, सुवर्णकुमारों के वेणुदेव और ताली, अग्निकुमारों के अग्निशिख और श्रग्निमारावं, वातकुमारों के वेसम्ब और प्रभञ्जन, स्तनितकुमारों के सुघोष और महाघोष, उदधिकुमारों के जलकान्त और जलप्रभ, द्वीपकुमारों के पूर्व और अवशिष्ट, दिक्कुमारों के अमितगति और अमितवाहन नाम के इन्द्र होते हैं ।
व्यन्तर देवों में किन्नरों के किन्नर और किम्पुरुष, किम्पुरुषों के सत्पुरुष और