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अध्याय । सातवां ]
१० ५१५ * उद्धलोक * देवों के भेष
देवाश्चतुरिणकायाः ॥११६६॥
देवों के चार भेद हैं....भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और कल्पवासी । . देवमति नाम कर्म के उदय होने पर और नाना प्रकार की विभूति युक्त होने के कारण जो द्वीप, समुद्र, पर्वत आदि स्थानों में अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करते हैं, उनको देव कहते हैं। जाति की अपेक्षा 'देवाश्चतुशिकायः' ऐसा एक वचनान्त सूत्र होने पर भी काम चल जाता, फिर भी सूत्र में बहुवचन का प्रयोग प्रत्येक निकाय के अनेक भेद बतलाने के लिये किया गया है । क्षेत्रों में लेश्याश्नों का वर्णन--
मादितस्त्रिषु पोतान्तलेश्याः ॥१२००॥
भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवों के कृष्ण, नील, कापोत और पीत ये चार लेश्याएँ ही होती हैं। . निकायों के प्रभेद--. .. दशाष्ट पञ्च द्वावश विकल्पाः कल्पोपपन्न पर्यन्ताः ॥१२०१॥
भवनवासी देवों के दश भेद, व्यन्तर देवों के आठ भेद, ज्योतिषी देवों के पांच भेद और कल्पोपपन्न अर्थात् सोलहवें स्वर्ग तक के देवों के बारह भेद होते हैं। अधेयक
आदि में सब अहमिन्द्र ही होते हैं, इसलिये वहां कोई भेद नहीं है। देवों के सामान्य भेद
. इन्द्र सामानिक बायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्ष लोक पालानीक प्रकोर्णकाभियोग्य
किल्विषिकाश्चैकशः ॥१२०२॥ . . . प्रत्येक निकाय के देवों में इन्द्र, सामानिक, वायस्थिश, पारिषद, प्रात्मरक्ष, लोकपाल, अनीक, प्रकीर्णक, प्राभियोग्य और किल्विषक-ये दश भेद होते हैं । .... इन्द्र -..जो अन्य देवों में नहीं रहने वाली अणिमा प्रादि ऋद्धियों को प्राप्त कर असाधारण ऐश्वर्य का अनुभव करते हैं, उनको इन्द्र कहते हैं।
सामानिक-आशा और ऐश्वर्य को छोड़कर जिनकी आयु, भोग, उपभोगादि इन्द्र के ही समान हों, उनको सामानिक कहते हैं।