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________________ ५१४ } [ गो. प्र. चिन्तामगि पुनः असंख्यात करोड़ वर्षों के जितने समय हों, उतने समयों से प्रत्येक रोम : खण्डों का गुणा करे और इस प्रकार के रोम-खण्डों से फिर उस गड्ढे को भर दिया जाय । इस गड्ढे का नाम उद्धार पल्य है । पुन: एक-एक समय के बाद एक-एक रोमखण्ड को निकालना चाहिये । इस क्रम से सम्पूर्ण रोम-खण्ड़ों के निकलने में जितना ... समय लगे उतने समय को उद्धार पल्योपम कहते हैं । दश कोड़ा-कोड़ी उद्धार-पल्यों का एक उद्धार सागर होता है । अढाई उद्धार सागरों अथवा पच्चीस कोड़ा-कोड़ी उद्धार पल्यों के जितने रोमखण्ड होते हैं, उतने ही द्वीप समुद्र हैं । एक वर्ष के जितने समय होते हैं, उनसे उद्धार पल्य के प्रत्येक रोमखण्ड का मुरंगी करे और ऐसे रोमखण्डों से फिर वह गड्ढा भर दिया जाय तंब इस गड्ड का नाम श्रद्धा पैल्य है । पुनः एक-एक समय के बाद एक-एक रोमखण्ड को निकालने पर समस्त रोमखण्डों के निकलने में जितने समय लगें, उतने काल का नाम श्रद्धा पल्यापम है । दस कोड़ा-कोड़ी अद्धा-पल्यों का एक अद्धा-सागर होता है । और दश कोड़ा-कोड़ी श्रद्धा-सागरों की एक उत्सर्पिणी होती है । अवंसपिरणी का प्रमाण भी यही है। प्रद्धा-पल्यापम से नरक तिर्यञ्च देव और मनुष्यों की कर्म की स्थिति, प्रायु की स्थिति, कार्य की स्थिति और भव की स्थिति गिनी जाती है। तिर्यञ्चों की स्थिति तिरंग्योनिजानाञ्च ॥११९८॥ मनुष्यों की तरह तिर्यञ्चों की भी उत्कृष्ट और जघन्य आयु क्रम से तीन . पल्य और अन्तर्मुहूर्त है। .. इस अध्याय मैं नरक, द्वीप, समुद्र, कुल पर्वत, पद्मादि हृद, गंगादि नदी, मनुष्यों के भेद, मनुष्य तिर्यञ्चों की आयु आदि का वर्णन है। अब ऊर्च लोक का वर्णन करते हैं.--... " mmmmmmmm m mmmmm
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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