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अध्याय : सातवां ]
.. { ५१३ हेतुभूत पुण्य का भी उपार्जन करते हैं । इसलिये प्राधा स्वयंभूरमरण द्वीप, पूरा स्वयंभूरमण समुद्र और समुद्र के बाहर चारों कोने कर्मभूमि कहलाते हैं। मनुष्यों को प्रायु का वर्णन
नस्थिती परावरे त्रिपस्योपमान्तमुहर्ते ॥११६७।। . मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु तीन पल्य और जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त है । पल्य के तीन भेद हैं--
व्यवहार पल्य, उद्धार पल्य और अद्धापल्य ।
व्यवहार पल्य से संख्या का, उद्धार पल्य से द्वीप समुद्रों का और अद्धा पल्य से कर्मों की स्थिति का वर्णन किया जाता है। व्यवहार पल्य का स्वरूप प्रमाणांगुल से परिमित एक प्रमाण योजन होता है । अवसर्पिणी काल के प्रथम चक्रवर्ती के अंगुल को प्रमाणांगुल कहते हैं । चौबीस प्रमाणांगुल का एक हाथ होता है । चार हाथ का एक दण्ड होता है । दो हजार दण्डों की एक प्रमारणगब्यूति होती हैं। चार गव्यूति का एक प्रमाण योजन होता है । अर्थात् पांच सौ मानव योजनों का एक प्रमाणयोजन होता हैं। मानव-योजन का स्वरूप- .
आठ परमाणुओं का एक त्रसरेणु होता है। आठ त्रसरेणुओं का एक रथरेणु होता है । पाठ रथरेणुगों का एक चिकुरान होता है । पाठ चिकुरानों की एक लिक्षा होती है। पाठ लिक्षाओं का एक सिद्धार्थ होता है। पाठ सिद्धार्थों का एक यव होता हैं । पाठ यवों का एक अंगुल होता है । छह अंगुलों का एक पांद होता है। दो पादों की एक वितस्ति होती है । दो वितस्तियों की एक रति होती है । चार रतियों का एक दण्ड होता है । दो हजार दण्डों की एक मन्यूति होती है । चार गव्युति का एक मानवयोजन होता है और पांच सौ मानव योजनों का एक प्रमाण योजन होता है।
एक प्रमाण योजन लम्बा, चौड़ा और गहरा एक गोल गड्ढा हो । सात दिन तक के मेष के बच्चों के बालों को कैंची से कतर कर इस प्रकार टुकड़े किये जायें कि फिर दूसरा टुकड़ा न हो सके । उन सूक्ष्म बालों के टुकड़ों से वह गड्ढा कूट कूटकर भर दिया जाय, इस गड्ढे को व्यवहार पल्य कहते हैं । पुनः सौ. वर्ष के बाद उस गड्ढे में से एक-एक टुकड़ा निकाला जावे । इस क्रम से सम्पूर्ण रोम खण्डों के निकलने में जितना समय लगे उतने समय को व्यवहार पल्योपम कहते हैं ।
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