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ग्रन्थ के संग्रहकर्ता परमपूज्य, वात्सल्य रत्नाकर श्रमरणरत्न स्यावाद केशरी श्री १०८ गरगधराचार्य कन्यसागर जी महाराज के प्रकाशित ग्रन्थ के बारे में विचार एवं
... मंगलमय शुभाशीर्वाद
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- अनादि संसार का विच्छेदन होने के लिये भव्यात्मानों को कुछ धर्म ध्यान का साधन होना चाहिये, आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान से बचने के लिये और शुक्ल ध्यान की प्राप्ति के लिए धर्म ध्यान ही साधनः .... मुख्य माना है। जैनाचार्यों ने कहा 'जीव धर्म ध्यान में तत्पर नहीं रहता है तो पात ध्यान और रौद्र ध्यान से नहीं बच सकता है, पात . ध्यान, रौद्र ध्यान नरक और तिर्यञ्चगति का कारण हो जायेगा,
गुबल ध्यान की प्राप्ति का मुख्य कारण धर्म ध्यान ही है, धर्म ध्यान ..... ... साधन है और शुबल ध्यान उसका कार्य है, दोनों ध्यानों .का फ़ल ..
मोक्ष सुख है, आत्मिक सुख है। हम लोग अनादिकाल से संसार में : .. - परिभ्रमण कर रहे हैं, सुख को प्राप्ति का उपाय भी खोज रहे हैं .
लेकिन निराशा ही हाथ लगी, क्या कारण हुमा ? इसमें कारण हुआ . . .
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