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ज्ञान का प्रभाव, ज्ञान के बिना जीव को एक क्षण भी शांति नहीं मिल सकती है। ज्ञान भी होना चाहिये । भेद विज्ञान-प्रात्मा शरीर जड़ अलग हैं इस प्रकार का ज्ञान ही भेदविज्ञान है, हमारे · चैतन्य स्वरूप से द्रव्य कर्म, भाव कर्म, नो कर्मों को अलग बताने वाला मात्र भेद विज्ञान ही है ।' ... . ........ ...भेदविज्ञान के अभाव में जीव ने द्रव्य कर्मों नो कर्मों को ही
अपना माना और उसी का फल है तो यहीं एक संसार और संसार . . हो दुःख का कारण है। हमारी आत्मा अनादि से शुद्ध स्वरूप द्रव्यापेक्षा है टंकोत्कीर्ण ज्ञायक स्वभाव यह है, व्यक्त अमर अविनाशी है, चैतन्य स्वरूप होने पर भी कर्मों के संयोग से संसार में जन्म-मरण के दुःखों को उठा रहा है, जन्म, मरण पर्याय हमारी नहीं है, ये तो . संयोगज हैं। कर्म संयोग से होने वाली अवस्था हमारे ग्रात्मा की कभी नहीं हो सकती है, हमें भेद विज्ञान से केवल कर्म से होने वाली पर्यायों को दूर करना है नष्ट करना हैं, हमें अपने स्वरूप में माना है, यही भेद विज्ञान का सार है, भद विज्ञानी इस
कार्य को कर सकता है । मोही, रागी, द्वेषी नहीं, मोह, राग, द्वेष _____ अनन्त: संसार का कारण हैं। हमने इन्हीं को अनादि से नहीं छोड़ा ...
है। फल मिला दुःख, अनादि संसार, हमें प्रथमतः द्रव्य कम, भाव कर्म, नो कर्मों का स्वरूप और ज्ञानधन स्वभाव वाला प्रात्मा का स्वरूप अवश्य जानना चाहिए; उसको जानने का साधन मात्र जिनागम का स्वाध्याय, स्वाध्याय करने से वस्तु स्वरूप का ज्ञान होता है और . यह ज्ञान भेद-विज्ञान होने में सहायक बनता है। इसी भेद-विज्ञान की प्राप्ति के लिये बात ध्यान रौद्र ध्यान से बचने के लिये स्वाध्याय
रूप धर्म ध्यान का प्राचार्यों ने ज्ञानी पुरुषों ने सहारा लिया है । धर्म । ध्यान में स्थिर रहने के लिये, आगम ग्रन्थों की रचना, पठन पाठना
दिक का सहारा लिया, और धर्म ध्यान की सिद्धि की, हम लोग
छदमस्थ चंचल चित्त हैं। हम लोगों को भी धर्म ध्यान की सिद्धि के । लिये पूर्वाचार्यों की रचना का पठन-पाठनादि क्रिया को अवश्य करना.
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