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[ गो. प्र. चिन्तामरिंग के भूयत्थंगाभिंगदा जीवाजीवाय पुरापाव ।। श्रास्सव संधर गिज्जर बन्यो मोवखो य सम्मत्तं ।।१
परमार्थ रूप से जाने हुए जीव, अजीव, पुण्य, पाप, अास्त्रब, संवर, निर्जरा वन्ध और मोक्ष ये नौ पदार्थ सम्यग्दर्शन है। यहाँ विषय और विषयी में अभेदः
मानकर जीवादि पदार्थों को ही सम्यग्दर्शन कहा गया है। अर्थात् इन नौ पदार्थों का ... परमार्थ रूप से श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। इसी से द्रव्यानुयोग में स्व पर के श्रद्धान
की भी सम्बदर्शन कहा गया है, क्योंकि ग्रास्त्रवादिक तत्त्व स्व-जीव और पर-कमरूप अजीव के संयोग से होने वाले पर्यायात्मक तत्त्व है, अतः स्व-पर में ही गभित हो जाते हैं। अथवा इसी द्रव्यानुयोग के अन्तर्गत अध्यात्म ग्रन्थों में पर. 'द्रव्यों से भिन्न (दर्शनमात्मविनिश्चिति:१ ) अात्म द्रव्य की प्रतीति को सम्यग्दर्शन कहा है, क्योंकि प्रयोजन भूत तत्त्व तो स्वकीय प्रात्म' द्रव्य ही है। स्व का विनिश्चय होने से पर स्वतः छूट जाता है। . . . . . . . .
.. मूल में तत्त्व दो हैं..जीव और अजीव । चेतना लक्षगा वाला जीव है और उससे भिन्न अजीव है । अजीव पुद्गल, धर्म, अधर्म, अाकाश और काल के भेद से पाँच प्रकार का है । परन्तु यहाँ उन सवसे प्रयोजन नहीं हैं। यहां तो जीव के साथ संयोग । को प्राप्त हुए नोकर्म, द्रव्यकर्म और भावकर्म रूप अजीव से प्रयोजन है । चैतन्य स्वभाव । वाले जीव के साथ अनादिकाल से ये नो कर्म शरीर, द्रव्य कर्म. ज्ञानाघरगणादिक और भाषकर्म रागादिक लग रहे हैं ! ये किस कारण से लग रहे हैं, जद इसका विचार प्राता है, तब प्रास्त्रव तत्त्व उपस्थित होता है । श्रास्त्रव के बाद जीव और अजीव की । • क्या दशा होती हैं ? यह बताने के लिये बन्ध तत्व पाता है। प्रास्त्रव का विरोधी भाव संबर है, वन्ध का विरोधी भाव निर्जरा है तथा जब सब नोकर्म, द्रव्यकर्म और भावार्म जीव से सदा के लिये सर्वथा विमुक्त हो जाते हैं, तब मोक्षतत्व होता है । पुण्य और पाप प्रास्त्रब के अन्तर्गत है। इस तरह श्रात्मकल्याण के लिए उपयुक्त
सात तत्त्व अथवा नौ पदार्थ प्रयोजन भूत हैं। इनका वास्तविक रूप से निर्णयः ।। • कर प्रतीति करना सम्यग्दर्शन है। ऐसा न हो कि प्रास्त्रव और बन्ध के कारणों को
संवर और निर्जरा का कारण समझ लिया जाय.. अथवा जीव की रागादिक पूर्गा । अवस्था को जीव तत्त्व समझ लिया जाय या जीव की वैभाविक परिणति (रागादिक) १. . पुरुषार्थसिद्धयुपाय' ।
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