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________________ अध्याय दूसरा : सम्यग्दर्शन प्रश्न : --- सम्यग्दर्शन का लक्षण क्या है ? उत्तर :- "श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागम तपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टांगं सम्यग्दर्शनमस्मयम्” ॥११ "अत्तागम तच्चीणं सद्दह्णां सुगिम्मलं होइ । संकाई दोसरहियं तं सम्मत मुणेयब्वं" ॥२ प्रथमानुयोग और चरणानुयोग में सम्यग्दर्शन का स्वरूप प्रायः इस प्रकार बताया गया है कि परमार्थ देव-शास्त्र-गुरु का तीन मूढताओं और आठ मदों से रहित तथा प्राठ अंगों से सहित श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी देव कहलाता है। जैनागम में अरहन्त और सिद्ध परमेष्ठी की देव संज्ञा है । Atary सर्वज्ञदेव की दिव्यध्वनि से अवतीर्ण तथा गणधरादिक प्राचार्यों के द्वारा गुम्फित आगम शास्त्र कहलाता है और विषयों की ग्राशा से रहित निग्रन्थ- निष्परिग्रह एवं ज्ञान, ध्यान और तप में लीन साधु गुरु कहलाते हैं • हमारा प्रयोजन मोक्ष है, "उसकी प्राप्ति इन्हीं देव, शास्त्र, गुरु के श्रद्धान से हो सकती है । अतः इनकी दृढ़ प्रतीति करना सम्यग्दर्शन है। भय, ग्राशा, स्नेह या लोभ के वशीभूत होकर कभी भी कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरुयों को प्रतीति नहीं करना चाहिए । वेन्द्र, यानुयोग में प्रमुखता से द्रव्य, गुण, पर्याय अथवा जीव, प्रजीव, ग्रास्त्रय, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन सात तत्वों एवं पुण्य पाप सहित नौ पदार्थों की चर्चा श्राती है, ग्रतः द्रव्यानुयोग में सम्यग्दर्शन का लक्षणं तत्त्वार्थ श्रद्धान (तस्वार्थ श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ) बताया गया है । तत्त्वरूप अर्थ अथवा तत्व अपने-अपने वास्त for स्वरूप से सहित जीव, अजीवादि पदार्थों का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है । अथवा. रत्नकरण्ड श्रावकाचार गांधा वसुनन्दि - समयसार - गाथा १३
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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