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________________ अध्याय : पांचवां ] क्लेशसंतति काटने वाली विद्या और उसका प्रभाव-- सर्व सत्त्वाभयस्थानं वर्णमाला विराजितं । स्मर मंचं जगज्जंतुक्लेश संततिघातकम् ।।५१६।। हे मुनि! तु समस्त जीवों का अभय स्थान तथा जगत के जीवों के क्लेश को सन्तति को काटने वाला और अक्षरों को पंक्ति से विराजमान ऐसे मन्त्र का चिन्तवन कर। वह मन्त्र यह है---ॐ नमोऽहते केवलिने परमयोगिनेऽनन्त शुद्धि परिणाम विस्फुर दुरु शुक्लध्यानाग्नि निर्दग्ध कर्म बीजाय प्राप्तानन्त चतुष्टयाय सौभ्याय शान्ताय मंगलाय वरदाय अष्टादश दोष रहिताय स्वाहा' । मुख कमल में मंत्र का ध्यान स्मरेन्दु माण्डलाकारं पुण्डरीक मुखोदरे । दलाष्टक समासीनं वर्णाष्टक विराजितं ।।५२०॥ हे मुने! तू मुख में चन्द्र मण्डल के आकार का, आठ अक्षरों से शोभायमान, ग्राठ पत्रों का एक कमल चिन्तवन करे । ॐषमो अरहताणमिति धरानपि कमात् । एकशः प्रतिपत्रं तु तस्मिन्न व निवेशयेत् ॥५२१॥ 'ॐ गामो अरहता' ये अाठ अक्षर मुख में स्मरण किये हुए उस कमल के पाठों पत्रों पर कम से एक-एक अक्षर का स्थापन कर ध्यान करना चाहिए । स्वर्णगौरी स्वरोद्भता केशरालों ततः स्मरेत् । कणिकां च सुधास्यन्द बिन्दु बज विभूषिताम् ॥५२२॥ तत्पश्चात् अमत के झरनों के बिन्दुओं से सुशोभित करिंगका का चिन्तवन. करे और उसमें स्वरों से उत्पन्न हुई तथा सुवर्ग के समान गौर वर्ण वाली केशरों की पंक्ति का ध्यान करे। प्रोत्संपूर्ण चंद्राभं चंद्राबिम्बाच्छनैः शनः । . समागच्छत्सुबाबीजं माया वर्ण तु चिंतयेत् ।।५२३।। पश्चात् उदय को प्राप्त होते हुये, पुर्ण चन्द्रमा के कान्ति समान, चन्द्रबिंव से मंद-मंद अमृत बीज को प्राप्त होते हुए माया वर्ण ह्रीं का चिन्तन करे। .. मायाबीज ही का ध्यान---.. विस्फुरन्तमति स्फीतं प्रभा मण्डल मध्यगम् । संचरन्तं मुखाम्भोजे तिष्ठन्तं करिणकोपरि ॥५२४।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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