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[ गो. प्र. चिन्तामणि भ्रमन्तं प्रतिपत्रेषु चरन्तं वियति क्षणे । छेदयन्तं मनोध्वान्तं स्त्रवन्त ममताम्बुभिः ।।५२५।।। व्रजन्तं तालुरन्ध्रय स्फुरन्तं ध्र लतान्तरे । ज्योतिर्मय मिवा चिन्त्य प्रभाव भावयेन्मुनिः ।।५२६॥
उपर्युक्त माया बीज ह्रीं अक्षर को स्फुरायमान होता हुआ, अत्यन्त उज्जवल प्रभा मंडल के मध्य प्राप्त हुआ, कभी पूर्वोक्त मुखस्थ कमल में संचरता हुआ तथा कभी-कभी उसकी करिंगका के उपरि तिष्ठता हुया, तथा कभी-कभी उस कमल के पाठों दलों पर फिरता हुअा तथा कभी-कभी क्षण भर में आकाश में चलता हुना, . मन के अम्बान अंधकार को दूर करता हुना, अमृतमयी जल से चता हुया तथा तालुका के छिद्र से गमन करता हुआ तथा भौहों की लताओं में स्फुरायमान होता हुआ,... ज्योतिर्मय के समान अचिन्त्य है प्रभाव जिसका ऐसे माया वर्ण का चिन्तवन करे ।
वाक्यथातीत माहात्म्यं देव दैत्योरगाचितम् । विद्यार्णवमहापोतं विश्वतत्त्व प्रदीपकम् ।।५२७॥
इस मन्त्र का महात्म्य वचनातीत है, इसको देव दैत्य नागेन्द्र पूजते हैं तथा यह मन्त्र विद्यारूपी समुद्र के तिरने को महान् जहाज है और जगल के पदार्थों को दिखाने के लिए दीपक ही है ।
प्रमुमेव महामन्त्रं भावयन्नस्त संशयः । . अविद्या व्याल संभूतं विष वेग निरस्यति ।।५२६ ।।
इसी महामन्त्र का संशय रहित होकर ध्यान करने वाला मुनि विद्या रूपी सूर्य से उत्पन्न हुए विष के वेग को दूर करता है।
इति ध्यायन्नों ध्यानी तत्सलोनैक मानसः।. वाङ्मनोमल मुत्सृज्य श्रु ताम्भोधि विगाहतो ॥५२६॥
ऐसे पूर्वोक्त प्रकार इस मन्त्र का ध्यान करता हुया और उस ध्यान में ही लीन है, मन जिसका ऐसा जो ध्यानी है, वह अपने मन तथा वचन के मल को नष्ट करके श्रुत समुद्र में अवगाहन करता है अर्थात् शास्त्र रूपी समुद्र में तैरता है। .
तलो निरन्तरामासान्मासैः षभिः स्थिराशयः । मुखरन्ध्राद्वि निर्यान्तीं . धूमति प्रपश्यति ।।५३०।। __ तत्पञ्चात् वह ध्यान स्थिर चिन होकर निरन्तर प्रयास करने पर छह