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अध्याय : पांचवां ] महीने में अपने मुख में निकलती हई (धूम) धुओं की वत्तिका देखता है ।
लत्तः । संवत्सरं यावत्तथैवाभ्यस्यते यदि । प्रपश्यति महाज्वालां निःसरन्ती मुखोदरात् ।।५३१।।
तत्पश्चात् यदि एक वर्ग पर्यन्त उसी प्रकार अभ्यास करे तो मुख में से निकलती हुई महा अग्नि की ज्वाला को देखता है ।
ततोऽतिजात संवेगो निर्वेदालम्बितो वशी।
ध्यायन्पश्यत्य विश्रान्तं सर्वज्ञ मुख पडजम् ।।५३२॥ तत्पश्चात् अतिशय उत्पन्न हुआ है, धर्मानुराग जिसके ऐसा वैराग्यावलम्बित जितेन्द्रिय मुनि निरन्तर ध्यान करता-करता सर्वज्ञ के मुख कमल को देखता है ।
अथाप्रति हतानन्द प्रीरिपतात्मा जिलश्रमः । श्रीमत्सर्वज्ञ देवेशं प्रत्यक्षमिव वीक्षते ॥५३३१॥
यहां से वही ध्यानी अनिवारित अानंद से तृप्त है, अात्मा जिसका और जीता है दुःख जिसने ऐसा होकर श्रीमत्सर्वज देव का प्रत्यक्ष अवलोकन करता है।
सतिशय संपूर्ण दिव्यरूपोपालक्षितम् । कल्याणमहिमोपेतं सवसत्त्याभय प्रदम् ।।५३४।।
सर्वज्ञ को ध्यानी कैसे प्रत्यक्ष देखता है कि सर्व अतिशयों से परिपूर्ण दिव्य ... रूप से उपलक्षित पंच कल्याणक की महिमा सहित समस्त जीवों को अभयदान देने वाला है।
प्रभावलय मध्यस्थं भन्य राजीव रजकम् । ज्ञान लीलाधरं बोरं देवदेवं स्वयंभुवम् ॥५३५॥
प्रभावलय के बीच में स्थित हुए भव्यरूप कमलों को रंजायमान करने वाले, ज्ञान की लोला के धरने वाले, विशिष्ट लक्ष्मी वाले, देवों के देव स्वयंभू ऐसे सर्वज्ञ को साक्षात् देखता है।
ततो विधूत तन्द्रोऽसौ तस्मिन्संजातनिश्चयः । भवनम मपाकृत्य लोकानमधि रोति ।।५३६॥
तत्पश्चात् इस मन्त्र का ध्यान करने वाला मुनि प्रमाद को नष्ट करके तथा इस मंत्र में सर्वन के स्वरूप का निश्चय हो जाने पर संसार भ्रम को दूर करके लोक ..' के अग्रभाग मोक्ष स्थान का प्राश्रय करता है ।
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