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[ गो. प्र. चिन्तामणि इस प्रकार मुख कमल में अटदल कमल में माठ अक्षरों को स्थापन करके कणिका के केशरों में सोलह स्वर स्थापन पूर्वक ह्रीं वर्ण का जो पूर्वोक्त प्रकार से "बान करे, उसका का महिना) वान किया : चित्र नं २३ । क्वी, विद्याका ध्यान किस प्रकार करना चाहिये ?
स्मर सकल सिद्ध विद्या प्रधानभूतां प्रसन्न गम्भीराम् । विद्य, बिम्ब निर्गतामिव क्षरत्सुधाी महाविद्याम् ।।५३७।।
हे मुने, तूं सकल सिद्ध विद्या का भी चितवन कर, क्योंकि वह विद्या प्रधान स्वरूप है, प्रसन्न है, गम्भीर है तथा चन्द्रमा के बिम्ब से निकली हुई के समान जो झरती हुई सुधा है, उससे अाद्रित है; ऐसी वह महाविद्या 'वीं' ऐसा अक्षर है।
अविचल मनसा ध्यायल्ललाट देशे स्थितामिमां देवीम् । प्राप्नोति मुनिरजस्त्रं समस्त कल्याण निकुरम्बम् ॥५३८॥
इस विद्या देवी को ललाट देश पर स्थित करके, निश्चल मन से निरन्तर ध्यान करता हुआ मुनि समस्त कल्याण के समूह को प्राप्त होता है।
अमृत जलधिगर्भात्रिः सरन्ती सुदीप्ता,
मलकतल गिषयां चन्द्रलेखां स्मरत्वम् । : अमृतकण विकीर्णा प्लावयन्ती सुधाभिः, परम पद धरित्र्यां धारयन्ती प्रभावम् ।।५३६।।
है मुनि, तू इस अमृत के समुद्र से निकलती हुई, भले प्रकार देदीप्यमान, ललाट देश स्थित, अमृत के कणों से बिखरी हुई और अमृत से प्राद्रित करती हुई, चंद्रलेखा का स्मरण कर; क्योंकि यह विद्या मोक्षरूपी पृथ्वी में अपने प्रभाव को धारण करने वाली है।
एतां विचिन्तयने व स्तिमितेनान्तरात्मना । जन्मज्वरक्षयं कृत्वा यासि. योगी शिवास्पदम् ।।५४०॥ .
' इस विद्या को पूर्वोक्त प्रकार से अपने निश्चल मन से ध्यान करता हा ध्यानी योगी संसाररूप ज्वर का क्षय करके मोक्ष स्थान को प्राप्त होता है ।
चित्र नं० २३-क देखें ।
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