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________________ अध्याय : दसवां । [ ८३६ शिखा मानो स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग ही दिखा रही है और जिसमें से बहुत-सा धुआं निकल रहा है, ऐसी धूप को बत्तियों से देवेन्द्रों से पजित श्री जिनेन्द्र के पादारविंदयुगल को धूपित करे अर्थात् उक्त प्रकार की धूप से पूजन करे। जंबीर-मोच-दाडिम-कवित्थ-परणस-सालिएरेहि । हिताल-ताल-खज्जूर-रिंगबु नारंग-चारेहिं ॥१६६५॥ पूईफस-तिबु-मामलय-जंबु-विल्लाइ मुराहि मिठेहि।। जिरणपयपुर प्रो रयर्स फलेहि कुज्जा सुपक्केहि ॥१६६६॥ जंबीर (नीबू विशेष), मोच (केला), दाडिम (अनार), कपित्थ (कवीट या कैंथा), पनस, नारियल, हिताल, ताल, खजूर, निम्बु, नारंगी, अचार (चरोंजी), पूगीफल (सुपारी), तेन्दु, आंवला, जामुन, बिल्वफल आदि अनेक प्रकार के सुगंधित, मिष्ट और सुपक्व फलों से जिन-चरणों के आगे रचना करे अर्थात् पूजन करे । अधिह मंगलाणिय बहुविह पूजो वयरवन्वारिण । धूवदहणाइ तहा जिगपूयत्यं वितीरिज्जा ।।१६६७॥ पाठ प्रकार के मंगल-द्रव्य और अनेक प्रकार के उपकरण द्रव्य तथा धूपदहन (धूपायन ) आदि जिन-पूजन के लिये वितरण करे। . वसुनन्दी श्रावकाचार, वसु. प्राचार्य, पृ. १२६ सोम देव सुरि, उपासकाध्ययन, रविषेणाचार्यकृत, पद्मपुराण, भावसंग्रह गुणभद्राचार्य कृत, पूज्यपादाचार्य कृत अभिषेक पाठों में पूरा वर्णन, पंचामृताभिषेक और अष्टद्रव्यार्चना का वर्णन मिलता है, वहां से देखें । ये मूलसंध के प्राचार्य वसुनन्दी सैद्धान्तिक देव हैं, प्रामाणिक प्राचार्य हैं । इन्हि का मंतव्य हमने यहां दिया है । आगे और भी विशेष वर्णन करेंगे। प्रश्न :-मुनिराज ओ केशलोंच करते हैं, सो कहां-कहां का केश लोंच करते हैं और कहां-कहां का नहीं ? उत्तर :- मुनिराज शिर, दाड़ी, मूछ के केश उखाडते हैं। कोख और नीचे लिग बृषरण के केश नहीं उखाड़ते हैं। कांख और लिंग वृषरण के केशों की रक्षा करते हैं । ऐसी आम्नाय है, मुनियों को लोंच करना इसी प्रकार कहा है । चारित्रासार में लिखा है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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